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‘काला पादरी’ उपन्यास की समस्याएँ

मध्यप्रदेश के दुर्गम इलाकों में बसे आदिवासी समाज की यथार्थता एवं उनकी दर्दनाक स्थिति पर लिखा गया उपन्यास ‘काला पादरी’ साहित्य की अजोड उपलब्धि है | इस क्षेत्र में आदिवासियों के साथ घटित घटनाओं को लेखक तेजिंदर जी ने पूरी मार्मिकता एवं जिवंतता के साथ उभारा है | यह उपन्यास मध्यप्रदेश के ‘सरगुजा’ जिले के आदिवासियों को केंद्र में रखकर लिखा गया है | वहाँ की भोली, अनपढ़ और गरीब आदिवासी जनता धर्म के ठेकेदारों के द्वारा परिस्थिति वश धर्मान्तरित करना, सरकारी व्यवस्थातंत्र के द्वारा उनके काम के लिए बार-बार ठोकर खाना, अकाल के कारण भूख से मरनेवाले लोगों के साथ धर्म के आधार पर बर्ताव किया जाना इस उपन्यास की मूल समस्या हैं | इसके अलावा उनकी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक जैसी समस्याओं का चित्रण भी देखने को मिलता हैं | इस उपन्यास में लेखक का दृष्टिकोण व्यवस्था के साथ विरोध करता है | आदिवासी समाज का कल्याण करने की जगह उनको अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है |

आदिवासी इस देश के मूल निवासी माने गए है | वे पहले से ही जंगलों में निवास करते आये है, अतः जंगल से मिलनेवाली चीजें और जमीन के वो अधिकारी है | पर आज यह अधिकार उनसे छीन लिया गया है | इस उपन्यास को पढ़ते समय अनेक समस्याएं हमारे सामने आती है जो इस प्रकार हैं -

भूख की समस्या

‘काला पादरी’ उपन्यास की सबसे बड़ी समस्या भूख की समस्या है | मध्यप्रदेश में घोर अकाल पड़ने के कारण वहां की जनता खाने के लिए त्राहिमाम पोकर रही है | एक तो वे पहले से ही गरीब और आदिवासी होने के कारण उनकी स्थिति और भी बदतर हो गई है | कईं लोगों की जानें भी चली गई है | बीजापुर, अंबिकापुर जैसे गाँवो में मरे हुए लोगों की शिकायत भी की गई है | एक बूढ़ा व्यक्ति कहता है कि, उनकी बहू की मृत्यु भूख के कारण हो गई है तथा उसके कूछ दिन पहले उसके बेटे की भी मृत्यु हो गई है | कितनी दरिद्रता और भयावहता भरी हुई है इस मध्यप्रदेश के आदिवासी के लोगों में | उपन्यास में भूखमरी को दर्शाते हुए बताया गया है कि -
“इस क्षेत्र के आदिवासी पिछले कई दिनों से जहरीली जंगली बूटियाँ खा रहे हैं और जिले के भीतरी इलाकों में तो कुछ लोग अपनी भूख मिटाने के लिए बिल्लियों और बंदरों का शिकार कर, उनका मांस तक खा रहे है |”[1]

इन गाँवों में अकाल की भूख इस हद तक फैली है कि, वहां के आदिवासी भगवान से प्रार्थना करते है कि, उनके गाँव में हाथी आये और वह उनके घरों-झोंपड़ियों को तोड़-फोड़ कर तहस-नहस मचा दे | ताकि, सरकार की ओर से उसके बदले में घर बनाने के लिए सामान और कुछ पैसे मिले | जिन पैसों से वह अनाज व खाने का सामान खरीद सके | उतना ही नहीं, वे आदिवासी लोग अपने बगल के गाँव में बसे शेठ गोयल के वहाँ चावल के गोदाम से चोरी कर लाते है और पकडे जाने पर अपना गुनाह कबूल भी कर लेते है | इस अकाल ने तो लोगों की जान ही ले ली है | जेम्स खाखा के द्वारा कहा गया कथन “भूख का कोई धर्म नहीं होता” हमें सब कुछ बता देता है |

धर्मांतरण की समस्या

इस उपन्यास की दूसरी बड़ी समस्या धर्म परिवर्तन की है | मध्यप्रदेश के आदिवासी जाति को जो लोग परेशान करते है और धर्म परिवर्तन करवाते हैं उसकी काफी चर्चा इस उपन्यास में मिलती है | धर्म के ठेकेदार अपने धर्म का विस्तार करने एवं प्रभाव हेतु आदिवासियों को अपना शिकार बनाते है | इस उपन्यास में धर्म के लोगों के बीच आदिवासी समाज अपना अस्तित्व खो बैठता नजर आता है | एक ओर ईसाई मिशनरी है जो लोगों को हिन्दू में से ईसाई बना रहे है और दूसरी ओर हिन्दू संगठन है जो ईसाईयों को हिन्दू बना रहे है | इन दोनों के बीच आदिवासी समाज फँस गया है | जैसा कि उपन्यास में कहा गया है -
“एक लाख ईसाईयों को पुनः हिंदू बनाने की जूदेव की घोषणा”
“उरांव आदिवासियों के धर्मांतरण के आरोपी पादरी को छह माह की कैद तथा जुर्माना”[2]

अंबिकापुर क्षेत्र में आदिवासियों को बड़े पैमाने पर लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तन करवाया जा रहा था | उपन्यास में धर्म परिवर्तन करानेवाले ‘पादरी’ तथा ‘सिस्टर’ को न्यायाधीश के द्वारा सजा भी दी गई है | इस प्रकार दोनों धर्म अपने अपने फायदे के लिए लोगों का इस्तेमाल करते है और नयी नयी समस्याओं का सामना करते है | दोनों धर्म के लोग अपने अपने धर्म की आड़ में आदिवासी समाज का शोषण करते हुए नजर आते है | यहाँ धर्म की व्याखा धुँधली होती नजर आती है |

जब जेम्स खाखा को पता चलता है कि वह खुद भी इसी धर्मान्तरित से है तो वह अपने फ़ादर मेथ्यूज से कहता है -
“क्या यह सच नहीं कि हमारी इमेजेज में पहाड़ थे, नदियाँ थी, पेड़ थे, शेर थे, चीते थे, और राजा ने हमें बंधुआ बना दिया, फ़िजिकली और इक्नोमिकली एक्सप्लायट किया, लेकिन आपने क्या किया? यू रादर टेल्ड अस, आपने हमें पालतू बना दिया, हमारे लिये हिंदू फंडामेंडलिस्टों और आप में अब काई खास फर्क नहीं है | हमारी सारी इमेजेज छीन ली आप लोगों ने...,”[3]

व्यवस्थातंत्र और शोषण की समस्या

लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से व्यवस्थातंत्र का खोखलापन हमारे सामने प्रस्तुत किया है | राज्य का तंत्र भी इन लोगों के साथ अनैतिक व्यवहार करता है | आदिवासी किसान अपने खेत में एक कुआँ खुदवाना चाहता है, तो उसे कई विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है | एक कुएँ के लिए वे प्रत्येक अधिकारी के पास जाते हैं और लिखवाते हैं कि, हमारे पास बैंक का कोई कर्ज नहीं है | आदिवासी किसान अपने विकास के लिए एक के बाद एक अधिकारी से ठोकर खाता फिरता है |
“क्या सचमुच यह आश्चर्यजनक नहीं है कि किसी बैंक के भीतर आप पहली बार जायें और हाथ जोड़कर कहे कि साहब हमें यहाँ लिखकर दे दो कि हमारे उपर आपके बैंक का कोई कर्ज नहीं है और बैंक वाले साहब बड़ी हिकारत से कहें कि आज नहीं कल आना |”[4]

सरकारी तंत्र इन आदिवासियों को परेशान तो करती ही है पर साथ में उकना शोषण भी करती है | उनके अशिक्षित होने के कारण बैंक के कार्य में दिक्कत आती है | अतः अन्य लोग ही उसका कार्यभार सँभालते है जो उनका शोषण करते है |
“इस तरह ग्राम सेवक फार्म भरता है, पटवारी जमीन के कागज़ात तैयार करता है, व्यापारी कोटेशन लगता है, मैं रिपोर्ट तैयार करता हूं और हमारा ब्रांच मैनेजर तथा किसान इस करार पर दस्तख़त करते है और किसान के खेत में कुएं के लिए खुदाई शुरू होती है | फिर कुआ तैयार होने के बाद डीजल-पंप वहां पहुंचा दिया जाता है | इंट के भट्टे वाले से लेन-देन का हिसाब तय करने के बाद व्यापारी सत्रह हजार चार सौ आठ रुपये की जगह चौबीस हजार आठ सौ नब्बे रुपये का बिल तैयार करता है और सात हजार चार सौ बयासी रुपये का बंटवारा हो जाता है |”[5]

इस प्रकार इन गरीब किसानों से ज्यादा रूपये ले कर उनका शोषण किया जाता है |

स्थानांतर की समस्या

इस उपन्यास में आदिवासियों के जीवन में आयी समस्याएँ और बाढ़ जैसी समस्याओं को भी अभिव्यक्त किया गया है | नदी, पहाड़, रेलगाड़ी के साथ जीवन में कैसा परिवर्तन आ रहा है उसे भी उपन्यास ने प्रस्तुत किया गया है | आदिवासी लोग बाहर से आने वाले लोगों को एक ‘देवदूत’ के रूप में मानते है | वे बचपन से संघर्षशील है अपना जीवन गुजारने के लिए गाँव से शहर में भी स्थानांतर करते है | शहर में जा कर कठोर परिश्रम करते है और अपने बच्चों का पालन पोषण करते हैं |

आदिवासी का निवास स्थान ‘वन’ माना गया है | वे वन में रहकर अपनी जीवनयापन की चीजें प्राप्त कर लेते है | अतः उनके जीवन के साथ वन का अधिकार भी जुड़ा हुआ है | आज वन का अधिकार सरकार के हाथों में आ गया है | आदिवासी समाज ऐसी अनेक प्रकार की विषमताओं में अपना जीवन गुजार रहे है |

राजनैतिक समस्या

सरगुजा के स्थानीय आदिवासियों की समस्या का एक कारण मौजूद राजनीतिक चरित्र भी है | सत्ताधारी पक्ष अपने कार्यों की प्रशंसा करते हुए लोगों को खुश करता है, पर अपनी क्षति और गलतियों को कभी नही दोहराता | अख़बार में राज्य के मुख्यमंत्री आदिवासियों की संस्कृति के गर्व की बात करते हुए उनके विकास की बात करते है | इस बात पर जेम्स खाखा राजनीती पर कटाक्ष करते हुए कहते है -
“जेम्स ने अखबार वापस मेज पर रख दिया और हँसते हुए कहा, “दीदी, देखो इन पोलिटिशियंस को इन्हें अपने आदिवासियों की संस्कृति पर गर्व होता है, जबकि इन्हें शर्म आनी चाहिए कि वे आज भी नंगे रहते हैं |”[6]

मध्यप्रदेश के ‘सरगुजा’ जिले के वर्णन में बताया गया है कि ‘अकाल’ के समय में आदिवासियों को न सरकार ने मदद की और न ही चर्च ने | उपन्यास में स्पष्टतः कहा गया है कि स्वतंत्रता के बाद राजनीति ने स्वार्थ की भावना को अपनाया है | स्वतंत्रता के पूर्व और उसके बाद के उपन्यासों को पढ़कर निःसंदेह कह सकते हैं कि, निम्न जाति आज भी अधिकार के लिए अपना मुँह फाड़ रही है |

निरक्षरता और अंधविश्वास की समस्या

उपन्यास में ‘सरगुजा’ क्षेत्र के ‘महेशपुर’ गाँव का चित्रण किया गया है | महेशपुर गाँव में अशिक्षित कि संख्या स्त्रियों में अधिक दिखाई देती है | महेशपुर गाँव की लडकियाँ बाईस तेईस वर्ष की होते हुए भी अपने देह के प्रति जागृत नहीं हैं | उपन्यास में महेशपुर गाँव का जो वातावरण है वह सरगुजा से भी अलग प्रकार का है | महेशपुर गाँव के लोग अपने सरपंच के बारे में भी नहीं जानते है यह उनकी अज्ञानता है |
“कभी कभी तो होता यह है की किसान सिर्फ अंगूठा लगाता है और उसके बारे में सारी जानकारी ग्राम सेवक द्वारा भर दी जाती है |”[7]

उपन्यास में वर्णित उराँव आदिवासी समाज अपनी अज्ञानता एवं अशिक्षा के कारण अंधविश्वास में डूबे हुए है | उपन्यास के अनुसार ये लोग ओझा को बैगा कहते है | जब कोई व्यक्ति भूख के कारण पीड़ित होता है तो गाँव के लोग उसे खाना खिलाने के बजाय उसे गाँव के बैगा के पास झाड़ू-फूँक मरवाने के लिए ले जाते है | जो उनकी अज्ञानता और अंधविश्वास का बोधक है | भूख के कारण अगर वह ढीला हो जाता है तो लोग इसके शरीर में भूत या प्रेतात्मा का वास मान लेते है और गाँव का बैगा उसके सिर पर तथा पीठ पर झाड़ू से बार बार वार करता है | बैगा उसके चारों ओर घूमते हुए जोर जोर से चीखता है तथा कुछ कहता है, पर उसकी बोली अन्य लोगों की समज से परे है |
“बैगा के हाथ में झाड़ू है | उसने लाल रंग की लुंगी पहन रखी है | वह नंगे पाँव है | उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई है | उसने अपने माथे पर राख मल रखी है | उसके कंधों पर मोर पंख लटक रहे हैं | वह चीख रहा है | उसकी चीख की भाषा समझ के बाहर है | वह बार बार नीचे लिटाये गये आदमी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता है और चीखता है | शायद वह यह कहना चाह रहा है कि इस आदमी के शरीर में कोई प्रेतात्मा है, जिसे वह अपने मंत्रों के प्रभाव से बाहर निकाल देगा और वह व्यक्ति उसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो जायेगा |”[8]

यहाँ भटहरा गाँव के लोगों की जो मान्यता है उसे लेखक ने भी स्पष्ट कर दिया है | समाज के लोग भूत-प्रेत को ज्यादा मानते है | वे अशिक्षित है और न किसी का कुछ ज्ञान | यहाँ के आदिवासी लोग मरे हुए लोगों के शरीर को जमीन के अंदर गड्ढा खोद कर दफना देते है और उस पर नीम का पेड़ बो देते है | ताकि, उसकी दुष्ट प्रेतात्मा आसानी से बाहर न निकल पाये |

आर्थिक स्थिति की समस्या

यह आदिवासी लोग जंगल में रहने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी न थी | शहर से दूर होने के कारण अशिक्षा और पिछड़ेपन ने अपना स्थान जमा लिया था | उरांव आदिवासी के बारे में कहा गया है कि ये लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते है और अपना जीवन निर्वाह भी वहीं करते हैं | ज्यादातर ऐसे लोगों की गरीबी का कारण है सरगुजा में बरसात की कमी | उन्होंने अकाल का भयानक कारण सूखी जमीन बताया है | उनके पिछड़ेपन का लाभ आज नक्सलवादी ले रहे है | क्योंकि वे जान गये है कि, यह आदिवासी सभी प्रकार से पिछड़े है | उपन्यास में लेखक ने महेशपुर गाँव का वर्णन इन्ही दरिद्रता में किया है |

उपन्यासकार ने आदिवासियों की दशा का ऐसा वर्णन किया है कि, निम्नवर्ग की गरीबी का प्रत्यक्ष रुप सामने दिखाई देने लगता है | उस क्षेत्र की एक लड़की ने बालों में लाल रंग का ‘गंदा’ सा रिबन बाँध रखा है | यहाँ ‘गंदा’ शब्द एक गरीबी का बोध करता है | बीरइ लड़का उसके बेटे, बहू, पोते की मौत गरीबी और भूख के कारण होती है |
“गाँव के पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही एक जैसी धोतियाँ पहना करते | बच्चे नंगे रहते, थोड़ा बड़े होते तो माँ-बाप की पिछले साल की धोतियाँ वे भी अपने उपर ओढ़ लेते |”[9]

सरगुजा जिले के आदिवासी बच्चे अपनी आर्थिक तंगदिली के कारण रेलगाड़ी से माल चुराते है | ये बच्चे चलती रेल से माल नीचे गिरा देते है और खुद भी चलती रेल से नीचे उतर जाते है | ये बच्चे छोटे होने के बावजूद भी अपने निर्वाह के लिए अपनी जान से खेलते है | आदिवासी लोग ‘काली चाय’ पीते है | जो उनकी आर्थिक स्थिति का बोध कराती है |
“गाढे काले रंग की चाय | चाय में दूध नहीं था | सिर्फ शक्कर थी, चाशनी की तरह और तोता छाप पाउडर वाली काली चाय |”[10]

अंततः यह कहा जाता है कि, यह उपन्यास मध्यप्रदेश के सरगुजा इलाके में बसे आदिवासियों का लेखाजोखा है | जो अकाल, भूख, शोषण, धर्मान्तरण, निरक्षरता और गरीबी जैसी समस्यों से जूझ रहे है | लेखक ने उपन्यास के माध्यम से इन आदिवासियों की स्थितियों से हमे अवगत कराया है |

सन्दर्भ किताब :
一.‘काला पादरी’ उपन्यास – तेजिन्दर – नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली – प्रथम संस्करण – २००२

सन्दर्भ सूची :::

  1. ‘काला पादरी’ उपन्यास – पृ. २१
  2. वही – पृ. ३६
  3. वही – पृ. ४५
  4. वही – पृ. १२
  5. वही – पृ. १३
  6. वही – पृ. १०१
  7. वही – पृ. १३
  8. वही – पृ. ७१
  9. वही – पृ. ७०
  10. वही – पृ. ५९

जयदीप वी. चौधरी, पीएच.डी. शोधार्थी, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर नगर, आणंद – ३८८१२० ईमेल-jaydeepchaudhari17051990@gmail.com