Year-1, Issue-6, November-December 2011

 

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ISSN:2249-2372

बवंडर एवं अंतिम बयान कहानियों में अभिव्यक्त दलित जीवन के   सामाजिक सन्दर्भ

-          हरेश परमार[*] एवं शिवदत्ता वावळकर[]

 

गुजराती एवं हिन्दी में दलित साहित्य की उत्त्पत्ति मराठी में उभरे हुए दलित साहित्य आंदोलन की प्रेरणा से हुई है| दलित साहित्य के प्रेरणा स्त्रोत गौतम बुद्ध, महात्मा जोतिराव फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर रहे है| वर्तमान समय में दलित साहित्य अपनी वैचारिकी के आलोक में कई विचारधाराओं को साथ लेकर चलता है| यह साहित्य समय के साथ होनेवाले नये-नये परिवर्तनों को स्वीकारता है और हिंदू धर्म एवं उसके धार्मिक ग्रंथो में स्थापित की गयी शोषण, उत्पीड़न की मान्यताओं को नकारने का साहस भी करता है| अपने अभ्युदय के मूल में रही बुद्ध, महात्मा फुले, शाहुजी महाराजा, डॉ. आम्बेडकर की वैचारिकी, दर्शन तथा आंदोलन की विशाल परंपरा का भी निर्वाह करता है| दलित साहित्य ने एक रचनात्मक आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक न्याय और मानवतावाद की दिशा में सामाजिक प्रतिबद्धता से पहल की है| दलित साहित्य की यह पहल संकुचित, सिमित या किसी विशिष्ठ समुदाय केंद्रित नहीं है| अपितु वह समूचे मानव जाति को केन्द्र में रखकर वैश्विक दृष्टि का परिचय देनेवाली रही है| दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है और उसमें लिंग, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय आदि का कोई भेद नहीं है| लेकिन धर्म, जाति, समुदाय, संप्रदाय, लिंग, पंथ  के आधार पर समाज में भेदभाव को बढावा देनेवाली प्रवर्तियों एवं नीतियों का विरोंध जरुर है| वर्ण और वर्ग की अवधारणाओं में शोषक समुदाय द्वारा सताये जा रहे शोषित लोगों की वेदना, पीड़ा, दुःख-दर्द, उपेक्षा, अवमानना और जीवन संघर्ष की यथार्थ अभिव्यक्ति दलित साहित्य है|  

समसामयिक परिस्थितियों से गुजरते हुए हम सहम जाते है कि भारतीय  आजादी के साठ साल बीत जाने के बाद भी हमारे समाज में क्रूरता एवं जातीय शोषण की अतीतकालीन परंपरा जीवित है| यहाँ शोषण, अत्याचार और अन्याय आज भी हो रहा है| अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के कई प्रमुख अखबारों में यह खबर छपी थी कि, मिर्चपुर गाँव में एक परिवार के पिता और उसकी अपाहिज बेटी को जिंदा जलाया गया| यह कैसी अमानवीयता हमारे देश में आज भी बरक़रार है? औरत तो हर एक मजहब, धर्म में होती है किंतु दलितों में जिस औरत का जन्म हुआ वह औरत आखिर तक दलितों में भी दलित रहती है| वह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक, यौन उत्पीड़न-शोषण की शिकार है| हमारे समाज में संगठित नहीं है, परिवार है किंतु उनका समाज के साथ सामंजस्य नहीं है| हमारा समाज जन्म और लिंग के भेदभाव से मुक्त नहीं है| महिलाएं पुरुष के बराबर श्रम करती है किंतु उन्हें वेतन पुरुष से कम ही मिलता है| यह स्थिति दलित समाज में अत्यंत भयावह दिखाई देती है| दलितों में पुरुष से ज्यादा परिश्रम के कार्य नारी ही करती है| यद्यपि हमारा भारतीय समाज उनके प्रति मूक और बधिर दिखाई देता है|

दलित समुदाय की महिलाएं अनेक यातनाओं और दुखों को सहते हुए भी अपने अस्तित्व और अस्मिता के प्रति सजग रहती है| बरसों से समाज में पितृसत्ता की अहंवादी पुरुषप्रदान संस्कृति ने मनु की भाषा में नैतिकता के आडम्बर स्थापित किये है, जिसके खिलाफ आज कुछ महिलाएं आवाज बुलंद कर रही है| जागृत महिलाओं की आवाज साहित्य के क्षेत्र में अभिव्यक्ति करके अपने मानवाधिकारों को प्राप्त करना चाहती है| आत्मसम्मान और मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में दलित लेखन जिस सवेंदना को उपस्थित कर रहा है उसके बारे में जानने-समजने का प्रयास इस आलेख में किया जा रहा है| इस आलेख में बवंडर और अंतिम बयान यह दो कहानियाँ है| जिसमें दलित समाज की नाकामयाबियों का बखान करने के बावजूद भी दलित समाज के प्रति स्त्री के माध्यम से सामाजिक प्रतिबद्धता का निर्वाह किया गया है| बवंडर और अंतिम बयान इन कहानियों पर हम दलित समुदाय का सामाजिक यथार्थ और सामाजिक समस्याओं के बारे में बात करेंगे| यह कहानियाँ क्रमशः गुजराती एवं हिन्दी की है| इनका सृजन क्रमशः भी. न. वणकर और कुसुम वियोगी ने किया है| कहानियों की विशेषता यह है कि, दोनों के लेखक, परिवेश, भाषा और विस्तार भिन्न होते हुए भी दोनों की सवेंदना समान है| दलित स्त्री की मुक्त जीवन की अभिलाषा और न्याय-अधिकारों की चाहत का बोध है|

दलित साहित्य आज उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध, आत्मकथा आदि विद्याओ में मिलता है| गुजराती एवं हिन्दी दलित साहित्य में कहानी विद्या एक प्रमुख विद्या है| इस विद्या का स्वरुप बहुमुखी सृजन की व्यापकता धारण किया हुआ है| दलित कहानी विद्या में दलित स्त्री के विषय में भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आज भी लिखा जा रहा है| इसी संदर्भ में अपना गाँव (मोहनदास नैमिशराय), अंतिम बयान (कुसुम वियोगी), सिलिया, छौआ माँ, दमदार, (सुशीला टाकभौरे), दाई (हरीश मंगलम्), जूती पहनने का मन, गांठाळ (प्रवीन गढवी), दादरो, शारडी (चंद्रा श्रीमाली), मंकोडा (बी. केशरशिवम), अलाव (मावजी महेश्वरी), पहचान (विपिन बिहारी), सुमंगली (कावेरी), सुनीता (रजतरानी मीनू) आदि कहानियाँ प्रसिद्ध रही है| इन कहानियों से दलित नारी की दलित समाज में वास्तविक परिस्थिति क्या है? दलित नारी क्या चाहती है? और उसका सामाजिक सरोकार यथार्थ दृष्टि से उजागर हुआ है| इन्ही में से प्रतिनिधिक तौर पर यहाँ बवंडर एवं अंतिम बयान कहानियों में अभिव्यक्त दलित नारी के  सामाजिक संघर्ष और मानवीयता की दृष्टि से जीवन सरोकारों पर विचार करते है| गुजराती एवं हिन्दी भारत कि प्रमुख भाषा है| इन भाषाओं में रचे जा रहे दलित साहित्य के अभिव्यक्ति मूलक उद्देश की पड़ताल प्रस्तुत दो कहानियों की केन्द्रीय कथावस्तु में पिरोये गए संदर्भो का अवलोकन करने के पश्चात होती है| यह बोध सहजता से होता है की अभी भी दलित समाज के सामाजिक-आर्थिक संघर्ष की शृंखलाओं का दौर खत्म नहीं हुआ है|

बवंडर एक दलित स्त्री में उफनते विद्रोह की व्यथा-कथा है| जिसमें कथा नायिका जीवली अपने समाज से ज्यादा अपने आप पर भरोसा करती है| वह भारत के वर्णवादी व्यवस्था और सामंती मानसिकता वाले समाज के बीच अपनी अस्मिता को जागृत रखती है| एक दिन शंभुवा के खेत के कुएँ में पानी पिने जाती है| वह उस कुए के पास अपने विचारों में खो जाती है| तभी शंभुवा आता है और उसके ऊपर बलात्कार करने की कोशीश करता है, यद्पि जीवली अन्य स्त्रियों  की तरह नहीं है जो सवर्ण पुरुष के जाल में फंस जाएँ| अपने अस्तित्व के प्रति सजग नारी के समस्त गुणधर्म उसमें है| पितृसत्तात्मक समाज के पुरूषों की मानसिकता के शोषण-उत्पीडन के आयामों से बचने की चेतना जीवली की चरित्रगत विशेषता है| तो शंभुवा सामंती समाज का प्रतिनिधिक चरित्र है| जीवली शंभुवा को जानती है इसलिए उनके आने की आहट को पहचान कर उससे लोहा लेती है| शंभुवा भाग खड़ा होता है मगर यह सब देखने वाला फ़तेह सिंह गाँव में जूठी खबर फैलाता है कि

 दोडो...दोडो... कुंए में गिरी जीवली ![i]

इस झूठी खबर से गाववालों में जातीय अहं जाग उठता है| उनके लिए  एक अछूत ने गाँव का कुआँ अछूत किया इस धारणा के तहत जातिबोध उत्पन्न होता है| गांव के लोग तो जीवली को कोसते ही है, उनके दबाव में दलित वर्ग का तबका भी उसकी निंदा करने लगता है| अपितु जीवली को किसी की परवाह नहीं है| अपने अस्तित्व और आत्मबोध से क्रांतिदर्शी चेतना उसमें प्रवाहित होती है| जब गाँव के दलित मोहल्ले में आग लगती है तो जीवली अन्य गाँव वालो की तरह सिर्फ खड़े रहकर चुप नहीं रहती| हंसिया उठा के आग लगानेवाले सवर्ण लोगों की तरफ दौड़ पड़ती है| अन्याय- अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह की पुकार दलित साहित्य की सैन्धातिकी का मूलतत्व है| जिसके तहत सामाजिक संघर्ष की बारीकियों और समाज में घटित दलित आत्याचारों का यथार्थमूलक परिदृश्य जीवली के जीवन संघर्ष से सामने आता है| 

जीवली के समानांतर ही अंतिम बयान कहानी में मुख्य नायिका अतरो है|  अतरो के द्वारा दलित स्त्री का सामाजिक शोषण, श्रम जीवन, यौन उत्पीडन के संदर्भो का लेखा-जोखा उपस्थित होता है| दलित नारी की विपरीत परिस्थितियों  में अपना स्वाभिमान बचाए रखने की क्षमता और समाज में पग-पग पर संघर्षरत रहने की जीवनवादी दृष्टि का परिचय-बोध कराना अंतिम बयान का उद्देश रहा है| अतरो अपनी सहेली कमला और भरतरी के साथ रोजाना गाय-भैंस के न्यार फूस के लिए खेतों में निकल पड़ती थी| वही प्रधान का लडका राजेन्द्र अतरो पर मर मिटा था| अतरो उसे नफ़रत करती थी किंतु प्रधान का बेटा होने के नाते कोई भी दलित पुरुष-औरत उसे कुछ कह नहीं सकते थे| ग्रामीण परिवेश में डर, भय और वर्ण वर्चस्व की सामंती संस्कृति में दलित प्रताड़ित होता है| एक दिन राजेन्द्र देशी पिस्तौल दिखाकर अतरो की अस्मत लुटने की कोशीश करता है| अतरो निर्भय नारी है, उसने राजेन्द्र का पुरुषत्व ही नष्ट कर दिया| प्रधान का बेटा इस घटना के बाद गाँव में दिखाई नहीं देता और उसकी लाश गाँव के कुएँ में मिलती है| पुलिस-प्रशासन की जाँच-पड़ताल के दौरान अतरो सबके सामने अंतिम बयान के रूप में राजेन्द्र का काटा हुआ पुरुषत्व लहरा देती है| अन्याय का सामना करते हुए भी सच्चाई बयान करके अतरो अपनी नैतिकता का बोध करा देती है| सामाजिक-शारीरिक अत्याचारों के आईने में अतरो दलित जीवन की संघर्ष गाथा के सन्दर्भ बयान करती है|     

इन दोनों कहानियों के कथात्मक गठन में प्रस्तुत जीवली और अतरो की संघर्षमयी जीवन सवेंदना उन पहुलओं को निर्देशित करती है की दलित नारी शोषणमुक्त होने की मंशा रखती है| अपितु भारतीय पुरुषसत्तात्मक मानस उनके प्रति नकार, निम्नता और उपभोक्तावादी दृष्टि से ही देखता है| सामाजिक बराबरी के मानक कागजों पर ही रहते है| वास्तव में जीवन की यथार्थता बहुत ही भयावह है| अब हम समय, समाज और परिवेश के परिप्रेक्ष्य में उक्त दोनों कहानियों में अभिव्यक्त दलित वर्ग कि सामाजिक समस्याओं को समजने कि कोशिश करते है|

बवंडर कहानी में अभिव्यक्त दलित समाज के सामाजिक सन्दर्भ :

बवंडर कहानी में जंगल एवं खेतों में कार्यरत दलित समाज है| जीवली अपने खेत में कार्य करती है| जीविका निर्वाह हेतु जमीन से उपजनेवाली फसल अच्छी हो| उसे उनके खेत में लगे आम के फलों को कोई बरबाद न कर सके, इसकी चिंता है|  जीवली जवान हो चूकी है और उसके मन में एक लग्नोत्सुक कन्या की तरह भाव-भंगिमाएं जागृत होती है| अपने सुनहरे भविष्य के बारे में सोचती रहती है| किंतु ग्रामीण परिवेश के सवर्ण समाज के पुरुषों की नजर उसकी जवान देह पर लगी रहती है| सवर्ण समाज गाव में एक तरफ दलितों को अछूत मानते है और तिरस्कार करते है| वही दूसरी ओर उन्हें अपनी शारीरिक भूख के लिए दलित नारी कि देह के प्रति आकर्षण भी है| परस्पर विरोधी मानसिकता में अंतर्द्वंद की  स्थिति में सवर्ण लोग जीते है| अपनी इच्छा-आकांक्षा की पूर्ति भी कराना चाहते है और वर्ण-वर्ग शोषण को भी बरकरार रखना चाहते है| दलित समाज यह सब जानते हुए भी अपने अर्थाभाव में सवर्णों के वर्चस्व में दबाव महसुस करता है| जीविका निर्वाह के उचित साधनों के अभाव में दलित वर्ग अपने समाज की स्त्रियों का यौन शोषण होने देते है| यह मजबूरी कहो या चेतना का अभाव| इन  परिस्थितियों में भी जीवली अपनी पवित्रता बचाये रखती है| जवान उम्र में जीवन संघर्ष के सामाजिक-मानसिक आघातों को सहती है | यद्यपि सवर्ण समाज के पुरुषों को उससे क्या लेना-देना? नारी के लिए समाजव्यवस्था ने परंपरा से जो नैतिक और सामाजिक बंधन बनाये गए है, जिससे मानवीयता की प्रतिष्ठा नहीं होती| सामाजिक यथार्थ का यह वह पहलू है जिसमें जाति-वर्ग-स्त्री दासता की अतीतकालीन मान्यताओं ने शोषण को जीवित रखा है| कहानी के सवर्ण चरित्र शंभुवा और फ़तेह सिंह इसी परंपरा के निर्वाहकर्ता है| मौका मिलते ही अकेली दलित महिला का यौन शोषण-उत्पीडन करने की प्रवर्तियाँ उनमें पलती रही है| जीवली सवर्ण समाज की हरकतों को समज चूकी है इसलिए ही वह जागृत है| स्त्री-भोक्ता चरित्रों की प्रति संघर्षशील चेतना की पुरस्कर्ता है|  सामाजिक- आर्थिक परिप्रेक्ष्य में एक तरफ दलित समाज दबाव में है वही दूसरी ओर जीवली जैसी औरतें हार न मानकर संघर्ष करती है| एक तरफ शोषण है, तो दूसरी तरफ आत्म सम्मान के खातिर लडने की जागृत चेतना है| दलित जीवन की सामाजिक स्थिति और दलित समाज की भयग्रस्तता, अवमानना, मज़बूरी आदि के द्वारा रचनाकार ने सामाजिक-आर्थिक संदर्भों का अर्थ विस्तार किया है| जीवली कुएँ में गिरने की जूठी खबर सुनने के बाद आनेवाले कुछ संवादों को मिसाल के तौर पर  देखिये -

फ़तेह सिंह की आवाज सुन कर वन क्षण भर के लिए सजीव हो उठा| किंतु कोई आया नहीं| सभी अंदर-ही-अंदर बाते करने लगे|

अरी ऑ वाला की बिटिया जीवली, साली ने कुंआ अछूत बना दिया|

होई कुच्छू... वन में रही के शेर से बैर मोल लो ?

अभी गई थी गिर पड़ी होगी| अपने पाप से मरने दो[ii]

जीवली बचे या ना बचे उसकी किसी को फिकर नहीं है| सवर्ण लोगों को अपना कुआं अछूत हो गया उसकी ज्यादा फिक्र है| तो दलित समुदाय को अपने मोहल्ले पर आने वाली आफत की चिंता है| रमणिका गुप्ता की इस कहानी के बारे में टिप्पणी है कि

बवंडर में दलित समाज और दलित महिला के उत्पीड़न, भय और हौंसले को एक साथ बुन देते हैं भी. न. वणकर| भय, निडरता और विद्रोह का ताना-बाना बुनता है लेखक|[iii]  

आज के समय में दलित समाज भी ब्राह्मणवादी मानसिकता का शिकार है| कुछ दिन पहले पाटण, गुजरात के पी.टी.सी. महाविद्यालय में दलित लडकी पर हुए बलात्कार में दलित शिक्षक भी सामिल थे| उसका सीधा संकेत इस कहानी से प्राप्त होता है| परन्तु जीवली स्वाभिमानी, सम्मानी नारी है| उसे अपनी इज्जत के बदले जान भी चली जाए तो कोई गम नहीं है| जीवली के कुछ वक्तव्यों से यह समजना आसान है| जैसे-

मामा ! पाप उन लोगों का और भोगे हम ?

पर छोरी, हम अछूत है... और उसमे भी अबला का अवतार....?

इसलिए क्या भेडिये के बसमे हो जाऊं ?....गरीब हुई, अछूत हुई और अबला हुई, ऐसे किसी के गोड तले पिसा नहीं जा सकता| समझा ! आप लोग जाओ ऐसे अपमानित हो कर जीने से तो अच्छा है हम लड़ें|[iv]

अंतिम बयान कहानी में अभिव्यक्त दलित चेतना के सामाजिक सन्दर्भ :

            अंतिम बयान कहानी में भी दलित चेतना मुखर हुई है| नायिका अतरो सामान्य सी दिखने वाली युवा लडकी है| किंतु उसका जज्बा किसी भी सक्षम नारी से कम नहीं है| गाँव में प्रधान का बेटा राजेन्द्र दलित नारियों को छेडता है, उनका यौन शोषण करता है| वह उच्च जाति  और उसमें भी प्रधान का बेटा होने की वजह से गाँव के दलित उससे मुखालफत नहीं कर पाते| जबकि अतरो उन सभी का बदला एक पल में ही ले लेती है| जो अन्य स्त्रियों के साथ हुआ वह उसके साथ भी होने जा रहा था| उसने अपनी दराँती से राजेन्द्र का पुरुषत्व ही काट दिया| यह विद्रोह और आक्रोश की व्यथा नहीं है, वह सदियों की सामंती पुरुषी परंपरा, सत्ता का वर्चस्व, जातिप्रथा, धर्मसत्ता, राजनीतिक मक्तेदारी को तोडती है| दलित नारी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति के बारे में गढे गए मिथकों के प्रति अतरो ने विद्रोह प्रकट किया है| उसके प्रतिपक्ष में अंतिम बयान के रूप में पुलिस के समक्ष गवाही दी गयी है और स्त्री के नैतिकता, पवित्रता एवं समाज को नये सिरे से सार्वभौमिक बनाने का पक्ष प्रबल किया है| अतरो द्वारा दलित समुदाय और सवर्ण समाज को अचंभित कर देने का उद्धरण है

तभी अतरो दहाड़कर बोली, गाँववालो... और सिपईयों तूम भी सुनों| आपको बयान चाहिए, जरुर दूंगी| जरा रुकिये|....जैसे ही अतरो कागज का बंडल लेकर आई, दरोगा की उत्सुकता बढ गई| अतरो ने बयान के सबूत के तौर पर कागज़ के बंडल में से राजेन्द्र का काटा हुआ पुरुषत्व लहरा दिया|[v]

            बवंडर और अंतिम बयान कहानी के उपरोक्त विवेचना के आलोक में रचनाकार की सामाजिक प्रतिबद्धता, दलित संघर्ष का विस्तार और सामाजिक शोषण के प्रति विद्रोह की नवीनतम उपलब्धि का दर्शन-बोध होता है| यद्यपि सृजनात्मक संवेदना उद्देश पूर्ति की दिशा में समान रही है| कहानियों के विषय में नायिका दलित स्त्री है और वह दलित-पीड़ित होने के बावजूद सवर्ण मानसिकता को ख़ारिज करती है| दोनों कहानीयों में दलित चेतना विद्रोह, आक्रोश की लहर पैदा करती है| स्त्री के सशक्त होने का सामाजिक सन्दर्भ और अपने फैसले खूद लेने की स्वतंत्रता मानवीय सरोकारों को उजागर करती है|


[*]  हरेश परमार, अनुसंधान एवं शिक्षण सहायक (गुजराती), मानविकी विद्यापीठ, एफ ब्लॉक, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली 110068, Mo. 09716104937, Email hareshgujarati@gmail.com

[] शिवदत्ता वावळकर, Assistant Profesor, Hindi Vibhag, Central University  of Gujarat (CUG), Gandinagar (Gujarat), मोबाईल 9717913223, 9426926869, Email- shiva.janaisan@gmail.com


 

[i]  वणकर, भी. न., अनुवाद - उर्मिला विश्वकर्ता, बवंडर, गुजराती साहित्य में दलित कलम (सं. रमणिका गुप्ता), हजारीबाग: रमणिका फाउंडेशन, प्र. सं. २००१, पृ. ८८

[ii]  वणकर, भी. न., अनुवाद - उर्मिला विश्वकर्ता, बवंडर, गुजराती साहित्य में दलित कलम (सं. रमणिका गुप्ता), हजारीबाग: रमणिका फाउंडेशन, प्र. सं. २००१, पृ. ८८-८९

[iii] सं. गुप्ता, रमणिका (२००`१), गुजराती साहित्य में दलित कलम, नई दिल्ली: रमणिका फाउंडेशन, पृ. ९

[iv]. वणकर, भी. न., अनुवाद - उर्मिला विश्वकर्ता, बवंडर, गुजराती साहित्य में दलित कलम (सं. रमणिका गुप्ता), हजारीबाग: रमणिका फाउंडेशन, प्र. सं. २००१, पृ. ९०

[v]. वियोगी, कुसुम अंतिम बयान, दलित कहानी संचयन (सं. गुप्ता, रमणिका), नई दिल्ली: साहित्य अकादमी, सं. २००९, पृ. १४१

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