Included in the UGC-CARE list (Group B Sr. No 172)

“मैं सारा जीवन अपने विरोधियों और अपने ही उन मुट्ठीभर लोगों से लड़ता रहा हूँ, जिन्होंने अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए मुझे धोखा दे दिया. मैं बड़ी कठिनाईयों से कारवाँ को वहाँ तक लेकर आया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई देता है. कारवाँ को इसकी राह में आने वाली बाधाओं, अप्रत्याशित विपत्तियों और कठिनाईयों के बावजूद चलते रहना चाहिए. अगर वे एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहते है, तो उन्हें इस अवसर पर अपनी क्षमता दिखानी ही होगी. यदि मेरे लोग, मेरे साथी कारवाँ को आगे ले जाने के योग्य नहीं हैं, तो उन्हें इसे वहीँ छोड़ देना चाहिए, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा है, लेकिन उन्हें किसी भी रूप में इस कारवाँ को पीछे नहीं हटने देना चाहिए. मैं पुरी गंभीरता में यह संदेश दे रहा हूँ, जो शायद मेरा अंतिम संदेश हैं और मेरा विश्वाश है कि यह व्यर्थ नहीं जाएगा.”[1]

“ ‘आपका नाम क्या है ?’ गुप्ता का पहला सवाल था.
‘मुझे आर. वी. सिंह कहते हैं.’ राम्विअर सिंह ने जवाब दिया.
‘आप कहाँ के रहने वाले है ?’ गुप्ता ने दूसरा सवाल किया.
‘मैं बुलंद शहर का रहने वाला हूँ.’ रामवीर सिंह ने कहा.
‘सिंह साहब, आप क्या करते हैं ?’ गुप्ता ने अगला सवाल किया.
‘मैं व्यापर कर अधिकारी हूँ.’ रामवीर सिंह ने बताया.”[5]

“अब तक तो आर. वी. सिंह केवल सफाई ही करवाता था रामबती से, अब उससे खाना भी बनवाने लगा हैं. किचन में स्लेब, नल हर चीज को हाथ लगाती होगी वह.”[6]

“संविधान से देश चलता है साहब, समाज नहीं ! समाज परंपराओं से चलता हैं. इस पुरे मोहल्ले में ब्राह्मण-बनिए रहते हैं – धरम-करम से चलते वाले. आपको मेरी बात नहीं चंच रही है तो आप देख लीजिए साहब आप ही. आप रामबती से ही खाना बनवाना चाहते हैं तो आपको मकान खाली करना पडेगा.”[7]

“कोई एसी बात हो तो मानी जा सकती है जैसे – वह गन्दी रहती हो, उसमे चोरी-चकारी की आदत हो या उसे खाना ठीक से बनाना नहीं आता हो. पर रामबती में ऐसी कोई बात नहीं है. वह खाना बनाने में कुशल और इमानदारी महिला है. इसलिए केवल इस आधार पर उससे खाना नहीं बनवाने का कोई औचित्य नहीं है कि वह जाति से चूहडी है. ऐसा करना तो जातिवाद को बढ़ावा देना है. गुप्ता कि बात मानकर रामबती से खाना बनवाना बंद कर देना तो छुआछूत और जातिवाद के सामने हथियार दाल देना होगा जो समाज का सबसे बड़ा दुश्मन हैं और इसका विरोध मैं आज तक करता आया हूँ.”[8]

“यदि यह बात है तो मैं आपका मकान खाली करने के लिए तैयार हूँ. लेकिन जातिगत भेदभाव के आधार पर मैं रामबती से खाना बनवाना बंद नहीं करूँगा.”[9]

“सवर्ण-संहिता के अनुसार दलितों का इलाज पत्थर ही करते है. चेतना की सजा चेतनाशून्य, पत्थर से बढकर और कौन दे सकता था भला संवेदनहीन सवर्ण-संहिता की नजर में ?”[10]

“सामाजिक तथा आर्थिक पुननिर्माण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अश्पृश्य कभी भी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते.’[11]

Haresh Parmar, Research and Teaching Assistant in Gujarati (RTA in Gujarati), School of Humanities, Block – F, Room 47, Tagore Bhawan, Indira Gandhi National Open University, Maidan Garhi, New Delhi – 110068 Mo. 0 9716104937 Email – hareshgujarati@gmail.com