Included in the UGC-CARE list (Group B Sr. No 172)
Special Issue on Dalit LIterature
ओमप्रकाश वाल्मीकि रचित ‘सलाम’ कहानीसंग्रह की कहानियों में दलित विमर्श
सांप्रतयुगीन साहित्य में दलित विमर्श उभरकर आनेवाली सर्वथा नवीनतम विचारधारा है | हिन्दी साहित्य में इसी दिशा में माताप्रसाद, भगवानदास, मोहनदास नैमिशराय, सूरजपाल चौहान, जयप्रकाश कर्दम, सुशीला टाकभौरे, कुसुम वियोगी, डॉ.धर्मवीर, रूपनारायण सोनकर आदि ने योगदान दिया है | ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी दलितोत्थान की दिशा में अपनी लेखनी के हस्ताक्षर किये है | जूठन, धूंसपैठिये, अब और नहीं, मैं हिन्दू हूँ, प्रतिनिधि कविताएँ जैसी रचनाएँ उन्होंने लिखी है |

‘सलाम’ उनके करकमलों से नवनिर्मित कहानीसंग्रह है | प्रस्तृत संग्रह में सलाम, सपना, बैल की खाल, गौहत्या, बिरम की बहू, जिनावर, कुचक्र जैसी १४ कहानियाँ संग्रहित है | इस संग्रह की कहानियों का मूल कथ्य दलित जीवन है | इसमें लेखक ने दलित समाज की दरिद्रता, शोषण, शिक्षा का आभाव, अस्पृश्यता आदि का दर्दनाक चित्रण किया है |

सलाम :- सलाम संग्रह की पहली कहानी सलाम है, जो अंबेडकरवादी जीवन दर्शन से ओतप्रोत है | प्रस्तृत कहानी में हरीश, जुम्मन जैसे पात्रों के माध्यम से दलितों की बेबसी, उनकी व्यथा तथा उनकी मूक पीड़ा का अंकन हुआ है | इसमें जातिवाद के दंश का बड़ा ही मार्मिक निरूपण हुआ है | जैसे-
“ये सहर नहीं गाँव है ........यहाँ चूहड-चमारों को मेरी दुकान में तो चाय ना मिलती है ........कहीं और जाके पियो |”[१]
यकिनन सलाम कहानी लेखक के विचारों की बेबाक अभिव्यक्ति है | इसी दिशा में सपना कहानी में भी दलितों के द्वारा मंदिर निर्माण होने के बावजूद भी जब प्राण-प्रतिष्ठा का समय आता है तब जातिवाद की जड़े बाधक बनती है |

बिरम की बहू :- बिरम की बहू कहानी दलित परिवार की बिरम की बहू की कथा के साथ झूडी है | इसमें दलित नारी के बांझपन के दंश का वर्णन हुआ है | संतानहीनता की व्यथा का जहर जीवन में कैसे धोलता रहता है | इसी बात का प्रतिपाद्धय यह कहानी है |

पच्चीस चौका डेढ़ सौ :- पच्चीस चौका डेढ़ सौ यह कहानी दलितों के आर्थिक शोषण पर आधृत है | इस कहानी का नायक सुदीप है | अपार निर्धनता तथा अर्थाभावों की भारी मार झेलने के बावजूद भी सुदीप के पिता उनको शिक्षित करता है और सुदीप पढ़-लिखकर नौकरी करने लगता है | दलित का किसी महाजन या जमींदार से कर्ज लेना मानो अपनी जिंदगी को किसी कसाई के हाथों बैचने जैसा है | शोषण का ऐसा धिनौना रूप इस कहानी की पृष्ठभूमि है |
“तू अपणा आदमी है तेरे से ज्यादा क्या लेणा | डेढ़ सौ में से बीस रूपए कम कर दे | बीस रूपए तुझे छोड़ दिए | बचे एक सौ तिस | चार महीने का ब्याज | एक सौ तीस अभी दे दे | बाकी रहा मूल जिब होगा दे देणा | महीने के महीने ब्याज देते रहणा”| [२]
बैल की खाल :- काले औए भूरे के साथ झूडी यह कहानी अस्पृश्यता का पर्दाफाश करती है | गाँव में मरे हुए पशुओं को उठाना और उनकी चमड़ी से अपना गुजारा करना इन दोनों का कर्म था | प्रस्तृत कहानी का कथ्य बहुत ही स्पष्ट है कि पंडित बिरिज मोहन का बैल मर जाता है | उसे उठाने के लिए काले भूरे को बुलाया जाता है | जमींदार उन लोगों के साथ जो क्रूरता,अत्याचार करता है उनका वर्णन करते हुए लेखक ने लिखा है-
“कहाँ मर गए थे भोसड़ी के ......... तड़के से ढूंढ- ढूंढ के गोड टूट गए है और इब आ रहे हो महाराजा की तरियों ....... इस बैल को उठाएगा कौन ........... तुम्हारा बाप |” [३]
यह कहानी सच में दलितों के शोषण की, दरिद्रता की तथा उनकी इंसानियत की कहानी है | कहानी में आद्यन्त मार्मिकता और संवेदनशीलता विद्यमान है |

जिनावर :- धर की चार दीवारों के बिच भी नारी क्या सुरक्षित है | चार दीवारियों के बीच भी नारी को धरेलू हिंसा तथा यौन-उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ता है | इसी तथ्य को यह कहानी उद्धाटित करती है | इसमें लेखक ने बिरजू की बहू के माध्यम से नारी संवेदना का परिचय दिया है | वह कहती है –
“माँ .....माँ का धर तो बहुत पहले उजड़ गया था | यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज्यादा सुरक्षित है | कम से कम भेड़िये आवेंगे तो रूप-रंग बदल के तो ना आवेंगे |”[४]
कहने में कोई अतिश्योक्ति न होगी कि हमारे समाज में इन्सानी खाल में धूम रहे भेड़ियों को जिनावर कहानी में बेनकाब किया गया है |

खानाबदोश :- सुकिया नामक चरित्र के साथ झूडी यह कहानी दर-दर ठोकरे खाते हुए यायावर की भांति भटकते हुए यातनाग्रस्त और संधर्षरत दलितों के जीवन की करुणानिधि है | इस कहानी में प्रयुक्त यह कथन हमें बहुत कुछ कह जाता है –
“सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे | वह भारी मन से सुकिया के पीछे –पीछे चल पड़ी थी, उसके अगले पड़ाव की तलाश में, एक दिशाहीन यात्रा पर |” [५]
अम्मा :- हमारे समाज की गली-मोहल्ले साफ़ रखनेवाले सफाईकर्मी लोगों को जिंदगी नर्कागार से कम नहीं है | वाल्मीकि रचित ‘अम्मा’ कहानी में झाडू लगानेवाली एक दलित नारी के चरित्र के उज्जवल पक्षों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है | यहाँ लेखक ने अम्मा के पात्र के द्वारा नारकीय जीवन से मुक्ति पाकर स्वाभिमान से जीवन जीने का बहूमूल्यवान संदेश दिया है |

अंधड़ :- यह कहानी शिक्षित-नौकरीपेशा करनेवाले दलितों का दस्तावेज है | इस कहानी में सुक्कड लाल का चरित्र केंद्र में है | कहानी का मूल प्रतिपाध्य दिशाशुन्य होनेवाले नवदलितों को पलायन होने की बजाय अपनी जाति में रहकर बुराइयों को त्यागना है | इस प्रकार सलाम संग्रह की कहानियाँ दलित समाज के दुःख-दर्द, उत्पीड़न, और शोषण की व्यथा-कथा का कच्चाचिट्ठा है | इसी संदर्भ में धीरजभाई वनकर ने लिखा है –
“इनकी कहानियों में दलित जीवन में व्याप्त दरिद्रता, हीनता, विवशता, एवं दुःख के द्रश्यों को कई बार बड़ी सफलता से चित्रित किया गया है |” [६]
भय :- भय कहानी में अपनी जाति को छुपाने का भय व्यक्ति को कैसे पीड़ित करता है | इसी तथ्य को उद्धाटित किया गया है | प्रस्तृत कहानी में दिनेश अपनी जाति को छिपाता हुआ सवर्णों के बीच में अपनी जिंदगी व्यतीत करता है | लेकिन जब पर्दा हट जाता है तब उनकी पोल खुल जाती है | वह माँ को कहता है-
“वह देखो ...... सामने खड़ी है ......... तिवारी खड़ा है ...... उसे मालूम हो गया है .......... वह सबको बता देगा ....... सबको ........ |”
कहाँ जाय सतीश :- इस कहानी में सतीश जो पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहता है, लेकिन उसके पिता उनको अपने सफाईकर्म में रखना चाहता है | सतीश इस धृणित कर्म को त्यागना चाहता है | इसलिए वह धर छोड़कर चला जाता है | दर-ब-दर ठोकरे खानेवाला सतीश दलित होने के कारण कहीं भी स्थायी नौकरी नहीं कर पाता | उनको एक अपनाता है तो दूसरा त्याग देता है | जैसे-
“तो क्या बैंड-बाजे के साथ विदा करू ..... मेरी बेटी का भाई बनने के लिए एक डोम ही रह गया है ....... बहुत हो गया ........ मैं उसे एक मिनट भी इस धर में नहीं रहने दूंगी |” [७]
गौहत्या :- गौहत्या वाल्मीकि रचित एक मार्मिक कहानी है | कहानी का नायक सुक्का, जो दलित समाज का है | वह गाँव के मुखिया के यहाँ सारे काम करता है | मुखिया की गाय किसी कारणवश मर जाती है तो उसका झूठा आरोप सुक्का पर लगा दिया जाता है | वह चिल्ला-चिल्लाकर कहता है –
“माई-बाप मैंने तो आज तक कभी जंगली सूअर का शिकार नहीं किया |” [८]
प्रस्तृत कहानी में भी दलितों के उपर होनेवाले जुल्म-अत्याचार को, उनकी यातनाग्रस्त जिंदगी को सटीक रूप में शब्दबद्ध किया गया है |

कुचक्र :- यह कहानी आरक्षण विरोधी मानसिकता का जीवंत प्रमाण है | यह कहानी हमें स्पष्ट इंगित करती है कि शिक्षा पाने के बावजूद भी यदि एकता न हो तो दलित कैसे तिनके की भांति टूट जाते है | यह कहानी जातिगत ईर्ष्या-द्वेष का भांडा फोडती है |

निष्कर्ष के रूप में यहीं फलित होता है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि कृत सलाम कहानीसंग्रह की कहानियों में दलित जीवन के विभिन्न कोण विद्यमान है | इन कहानियों में दलितों के प्रति होनेवाले जुल्म-अत्याचार है, शोषण है | इसमें सवर्णों की धिनौनी मानसिकता की गूंज सुनाई देती है | अंधविश्वासों, रुढियों और परम्पराओं की उबड-खाबड़ भूमि पर चल रहे दलित समाज की प्रामाणिक अभिव्यक्ति यहाँ हुई है | लेखक के भोगे हुए जीवन का यथार्थाकंन सलाम की कहानियाँ हैं |

संदर्भ संकेत :-
  1. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-१२
  2. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-८१
  3. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-१३
  4. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-६४
  5. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-१३२
  6. दलित एवं स्त्री विमर्श-सं. डॉ. गोवर्धन बंजारा, डॉ. लविन्द्रसिंह लबाना, डॉ. रेनू हिंगोरानी- पृ- ६३
  7. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-५२
  8. सलाम-ओमप्रकाश वाल्मीकि –पृ-६०
डॉ. भरतभाई खिमाभाई बावलिया, सहायक प्राध्यापक (हिन्दी), श्री आर. आर. लालन कॉलेज भुज-कच्छ | bk.bavaliya1981@gmail.com