Included in the UGC-CARE list (Group B Sr. No 172)
Special Issue on Dalit LIterature
आधुनिक हिन्दी कविता में दलित संवेदना के स्वर
शोधालेख सार :-

दलित साहित्य की कविताएं विभिन्न संवेदनाओं के स्वरों से परिपूर्ण हैं। इन कविताओं में सदियों से दमित, उपेक्षित, पीड़ित दलित लोगों की संघर्ष गाथा मौजूद है। इन कविताओं में दलित संवेदना के स्वर दलित कवियों के अंतः करण से निकले हुए स्वर हैं और वे जातिगत भेदभाव की पीड़ा के स्वर हैं।

बीज शब्द :- संघर्ष, पीड़ा, जन-जागृति, आक्रोश, अस्मिता, अस्पृश्यता, शोषण, दमन, जातिगत भेदभाव आदि।

आज हम एक ऐसे देश के निवासी हैं, जो एक जनतांत्रिक देश है। जिस देश का एक संविधान है। जिस देश ने आजादी की लंबी लड़ाई लड़ने के बाद एक स्वतंत्र जनतांत्रिक देश बनने की कामयाबी हासिल की है। हमारे संविधान निर्माताओं ने समाज के हरेक पहलुओं को अपने संविधान के दायरे में रखा है। समाज के हरेक पद्-दलित, उपेक्षित, दमित, शोषित तबके पर अपना विशेष ध्यान रखा है। जिसके फलस्वरूप भारत का संविधान आज मानवीय मूल्यों का एक विस्तृत एवं आदर्श दस्तावेज बन पाया है। वर्तमान समय में हम यह देख सकते हैं कि देश की तरक्की और विकास में संविधान का बहुत बड़ा योगदान है। इस संविधान के आधार पर ही समाज के सभी पद्-दलित, उपेक्षित वर्ग को बराबरी का दर्जा प्राप्त हो सका है। देश के विकास में समाज के सभी तबकों का योगदान है, क्योंकि हमारा देश एक जनतांत्रिक देश है, वह सभी को समान अवसर प्रदान करता है। समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव, अस्पृश्यता, शोषण, दमन, उत्पीड़न के खिलाफ हमारा संविधान एक प्रहरी की भांति अडिंग है। आजादी से पूर्व देश में जो शोषण, दमन की प्रक्रिया की लंबी लाइन थी, उसे देश ने जनतांत्रिक दर्जा प्राप्त करने के पश्चात तोड़ सा दिया है। आज हर समुदाय समान है तथा समानता का व्यवहार करता है। भले ही वह चाहे जिस कुल, गोत्र, जाति, समूह का क्यों न हो। वह अपने शोषित स्वरूप और शोषक नीतियों को भी पहचानने लगा है। आज सभी को एक जनतांत्रिक देश में समान अवसर प्राप्त हैं। सदियों से जिस वर्ग को समाज और साहित्य ने हाशिए पर धकेल दिया था, जिसे शूद्र, पतित, दलित कहकर उपेक्षित समझा जाता था, जिसे नीच समझकर दबाया जाता था वही वर्ग आज अपने प्रखर आत्मबोध से स्वतंत्र देश में अपने अस्तित्व को अस्मितावान कर रहा है।

आधुनिक हिन्दी कविता में दलित जातीय जीवन की जागृति मुख्य धारा में रही है। दलित कविताओं से आधुनिक हिन्दी कविता का फलक विस्तृत हुआ है, समृद्ध हुआ है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दलित कविता से आधुनिक हिन्दी कविता का जनतंत्र और अधिक व्यापक हुआ है। इस कालखण्ड की दलित कविता के स्वर सामाजिक गैर बराबरी को मिटाने वाले स्वर हैं। तथाकथित सभ्य समाज में जिस वर्ग को हीन दृष्टि से देखा जाता रहा है, जिससे अमानवीयता का व्यवहार करता जा रहा है उन्हीं के जन-जागृति के स्वर इन कविताओं में अभिव्यक्त हुए हैं। इन स्वरों ने सदियों से परंपरागत चले आ रहे ऊँच-नीच के जातिगत भेदभाव को मिटाने का कार्य किया है। आधुनिक हिन्दी कविता का जो जनतंत्र है उसमें दलित कविता अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यदि इस कालखण्ड से दलित कविताओं को अलग कर दिया जाए तो आधुनिक हिन्दी कविता का जनतंत्र अपनी संपूर्णता को कायम नहीं कर पाएगा। इन कविताओं में सदियों से चले आ रहे जातीय दंश के स्वर मिले हुए हैं। इनमें शोषित, दमित, उपेक्षित और पद्-दलित तबकों का दर्द कलह, पीड़ा आदि सभी संवेदनाएं मिली हुई हैं। प्रसिद्ध दलित साहित्यकार एवं आलोचक जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है- “दलित कविता दर्द से निकलती है, क्योंकि सदियों से दलितों ने दर्द ही सहा है, दर्द का ही अनुभव किया है। दर्द के अलावा उन्हें कुछ भी नहीं मिला है। दलित कविता में दर्द की अभिव्यक्ति प्रमुख है।”[1]

उपर्युक्त उद्धरण से यह स्पष्ट होता है कि दलित कविताओं में दर्द की अभिव्यक्ति अधिक है। यह दर्द दलित साहित्य का मूलभूत आधार है। यह उनका अनुभव किया हुआ दर्द नहीं है वरन् भोगा हुआ दर्द है। जो तथाकथित सभ्य समाज की प्रताड़ना से उपजा है। इसी दर्द ने असहनीय रूप धारण कर समाज में अपने को प्रतिष्ठित करने के लिए दलित कविता के रूप में प्रस्फुटित हुआ है। छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने इसी दर्द को करुणा, वेदना, कहकर अभिव्यक्त किया है-
“वियोगी होगा पहला कवि,
आह से निकला होगा गान;
उमड़ कर आँखों से चुपचाप,
वही होगी कविता अनजान!” [2]
आधुनिक हिन्दी कविता में दलित कविता की शुरुआत मूलतः हीरा डोम की कविता से मानी जाती है। हीरा डोम ने 'अछूत की शिकायत' नाम से एक कविता लिखी थी। यह कविता सन् 1914 ई० में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित पत्रिका 'सरस्वती' में छपी थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास सौ वर्षों से अधिक का है। यह कविता सन् 1914 ई० में छपी तो जरूर थी, किन्तु चर्चा के केन्द्र में बहुत बाद में आयी। इस कविता की चर्चा मुख्य रूप से डॉ० रामविलास शर्मा की पुस्तक 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण' से हुई। तभी से लोगों का ध्यान इस कविता की ओर गया। डॉ० रामविलास शर्मा की यह पुस्तक सन् 1977 ई० में प्रकाशित हुई थी। इस तरह यदि देखा जाए तो 1914 ई० से लेकर 1977 ई० तक के बीच के लगभग 63 वर्षों तक यह कविता चर्चा के केन्द्र में नहीं शामिल थी। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के वैचारिक परिदृश्य में दलित कविता का स्वरूप गायब सा था। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि हिन्दी में दलित साहित्य मराठी साहित्य के दलित विमर्श के प्रभाव से प्रस्फुटित हुआ है। प्रायः सभी विचारक इस बात का समर्थन करते हैं। अगर राजनीतिक स्तर पर हिन्दी में दलित विमर्श की चर्चा की जाए तो यह प्रतिबिंबित होता है कि हिन्दी प्रखण्ड में बहुजन हित चिंतक मान्यवर कांशीराम द्वारा राजनीतिक स्तर पर दलितों के हक की आवाज सुनाई देती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में दलित संवेदनाओं का जो स्वर मुखरित हुआ है वह नब्बे के दशक में राजनीतिक परिदृश्य में चल रही दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीतिक हलचल के कारण ही संभव हो पाया है। हालांकि इससे पहले भी हिन्दी साहित्य में दलित संवेदना के स्वर सुनाई देते थे। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों की कविताओं में दलित संवेदना के स्वर सुने जा सकते हैं। दलित संवेदना को अभिव्यक्त करते हुए निराला लिखते हैं-
“जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ, आओ, आओ!
आज अमीरों की हवेली
किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, तेली
खोलेंगे अंधेरे का ताला
एक पाठ पढ़ेंगे, टाट बिछाओ।” [3]
निराला ने इन काव्य पंक्तियों में जातीय वर्ग-भेद को समाप्त करने का स्वर दिया है। यह वह वर्ग है जिसमें अमीरी-गरीबी है, शोषक और शोषित हैं, कलह है, जातिगत भेदभाव की पीड़ा है। इस वर्ग में दलित वर्ग भी समाहित है। इन पंक्तियों में दलित संवेदना के स्वर भी अंकित हैं। इसी तरह रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी रचना 'रश्मिरथी' में दलित संवेदनाओं को अक्षरश: अंकित किया है। दिनकर द्वारा रचित 'रश्मिरथी' हिन्दी साहित्य की कालजयी रचनाओं में गिनी जाती है। कवि ने इस रचना को अपनी ख्याति का आधार बनाया है। यह खण्डकाव्य कर्ण को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। रामधारी सिंह दिनकर ने कर्ण के माध्यम से भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत वर्ग-भेद पर करारा प्रहार किया है। दिनकर ने इस रचना में जाति को निरर्थक घोषित किया है तथा कर्म पर अधिक जोर देते हुए लिखा है-
“पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से
रवि-सामान दीपित ललाट से, और कवच कुंडल से।
पढ़ो उसे जो झलक रहा है, मुझमें तेज प्रकाश
मेरे रोम-रोम में अंकित, है मेरा इतिहास।” [4]
उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने आजाद भारत की नई चेतना शक्ति को गढ़ा है। वे एक ऐसे भारत की मांग करते हैं जहाँ पर मनुष्य को उसके कर्म से पहचाना जाए न कि जाति, धर्म, कुल, गोत्र से। रामधारी सिंह दिनकर ने आजाद भारत की जन-जागृति की आकांक्षा को इस रचना के माध्यम से स्वर दिया है। दिनकर की कविताएं मानवीयता का एक नया संसार निर्मित करना चाहती हैं, जिसमें मनुष्यता और स्वतंत्रता का महत्व हो। इनकी कविताओं में एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना की गई है जिसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो, जिसमें किसी भी प्रकार की सामाजिक गैर बराबरी के लिए रिक्त स्थान न हो।

आधुनिक हिन्दी कविता में छायावाद के बाद प्रगतिवाद का दौर आता है। जिसमें दलित संवेदना के स्वर स्पष्ट सुने जा सकते हैं। यह वह दौर है जिसमें शोषित, दमित, उपेक्षित तथा हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों को स्थान दिया गया है। फलत: यह कहा जा सकता है कि दलित साहित्य हिन्दी साहित्य से अलग कर नहीं देखा गया था। दलित साहित्य वर्ग-भेद के अन्तर्गत ही था, किन्तु बाद में दलित चिंतकों ने इसे अलग से रेखांकित किया। इस बात का उल्लेख करते हुए उमा शंकर चौधरी ने लिखा है- “हिन्दी पट्टी में जब दलित विमर्श की शुरुआत हुई तब उनके सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती थी अन्य प्रगतिशील आंदोलन के बीच अपनी पहचान मुकम्मल करने की। प्रगतिशील आन्दोलन के यहाँ जिस सर्वहारा वर्ग या आम जन की चिंता थी दलित उनमें से एक थे। लेकिन दलितों की अपनी खास समस्या को उसमें धूमिल किया जा रहा था। इसलिए यह आवश्यक था कि दलित विमर्श अपनी अस्मिता को उस आन्दोलन से एकदम अलग कर ले। हिन्दी दलित विमर्श के सामने मराठी दलित पैंथर्स का जीता-जागता उदाहरण था। इसलिए उसने मार्क्सवादी आन्दोलन के समक्ष बहुत सतर्कता बरती। उसने इस गतिरोध पर विजय प्राप्त की। विमर्शकार इस संदर्भ में एकदम शुरुआत से ही स्पष्ट थे कि उनका भविष्य मार्क्सवादियों के साथ नहीं है।” [5]

उपर्युक्त उद्धरण से यह स्पष्ट होता है कि दलित चिंतकों, विचारकों ने बाद में दलित साहित्य को प्रगतिशील या यूं कहें कि मार्क्सवादी साहित्य से अलग कर रखा। अगर हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को दृष्टिबद्ध करें तो यह पता चलता है कि दलित साहित्य की उपस्थिति बहुत पहले से ही रही है। प्रसिद्ध विचारक भवदेव पांडेय ने निराला की काव्य-धर्मिता में दलित संवेदना के स्वर मौजूद होने की बात कही है। उन्होंने लिखा है- “निराला का साहित्य दलित चेतना का ऐसा दस्तावेज है, जो समय व समाज के तेज बदलावों के चलते दर्ज नहीं किया जा सका। दलित रचनाकारों द्वारा दलितों के जीवन पर लिखे साहित्य की वकालत करते समय निराला का लिखा दलित साहित्य आज भी महत्वपूर्ण गवाह के रूप में खड़ा है।” [6]

इस प्रकार हम आधुनिक हिन्दी कविता में दलित संवेदना के स्वर के अध्ययन स्वरूप बात करें तो यह पाते हैं कि हीरा डोम के बाद निर्घिनराम, स्वामी अछूतानंद, बिहारीलाल 'हरित' के अलावा हिन्दी के प्रारंभिक दलित काव्यकारों में कविरत्न महात्मा बख्शी दास, अयोध्यानाथ दण्डी, मौजीलाल मौर्य, मोतीलाल संत, रामचरण, बाबू राम नारायण, डॉ० मानिक चन्द्र आदि आधुनिक दलित कवियों का नाम मुख्य रूप से गिना जा सकता है। वर्तमान समय में दलित साहित्य को लेकर अनुसंधान स्वरूप कई नई बातें सामने आयी हैं। जो आधुनिक हिन्दी कविता में दलित साहित्य के शुरुआती स्वरूप पर प्रकाश डालती हैं। उक्त आधुनिक रचनाकारों के द्वारा आधुनिक हिन्दी कविता के अंतर्गत दलित कविता में एक बहुत बड़े खाली स्थान की पूर्ति होती है। इनके रचना-संसार में समाज के शोषित, दमित, उपेक्षित तथा पद्-दलित तबकों के अंतः कलह के स्वर सुनाई देते हैं।

हीरा डोम और निर्घिनराम के बाद स्वामी अछूतानंद हिन्दी दलित साहित्य के प्रसिद्ध कवि के रूप में जाने जाते हैं। स्वामी अछूतानंद साहित्यकार, कवि होने के साथ ही साथ एक अच्छे समाज सुधारक एवं सामाजिक नेता भी हैं। इन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कानपुर और लखनऊ क्षेत्र में दलित जन-जागृति प्रसारित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दलितों को नई शिक्षा देकर समाज में उनके हाशिए रूप से अलग कर उन्हें स्थापित करने की वकालत की है। दलितों में स्वाभिमान की भावना पैदा करने के लिए 'आदि हिन्दू' नाम से एक आन्दोलन भी चलाया था। स्वामी अछूतानंद ने दलितों की मार्मिक दशा को देखते हुए लेखन कार्य के अतिरिक्त 'आदि हिन्दू' आन्दोलन के सम्मेलनों में ओजस्वी भाषणों द्वारा दलित समुदाय में जागरूकता पैदा करने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने 'आदि हिन्दू' के एक विशाल सम्मेलन में कहा है कि-
“शूद्रों, गुलाम रहते, सदियां गुजर गई हैं।
जुल्मों सितम को सहते, सदियां गुजर गई हैं।।
अब तो जरा विचारों सदियां गुजर गई हैं।
अपनी दशा सुधारो सदियां गुजर गई हैं।।” [7]
स्वामी अछूतानंद ने बहुत सारी रचनाएं दलित उद्धार हेतु रचीं। इनकी रचनाओं का मुख्य भाव दलित जन-जागरण का था। स्वामी अछूतानंद के बाद बिहारीलाल 'हरित' हिन्दी दलित साहित्य के बड़े कवि के रूप में पहचाने जाते हैं। वर्तमान समय में दलित समाज का जो नारा है- 'जय भीम', वह बिहारीलाल 'हरित' की ही देन है। बिहारीलाल 'हरित' की रचनाओं पर सबसे ज्यादा प्रभाव डॉ० भीमराव आम्बेडकर एवं जगजीवन राम का है। इनकी कविताओं में दलित क्रान्ति के स्वर स्पष्ट सुनाई देते हैं। इनकी कविताएं मुख्य रूप से शोषण, गरीबी, पीड़ा और दुःख के विरुद्ध संघर्ष करती हुई प्रतीत होती हैं। बिहारीलाल 'हरित' की रचना-धर्मिता पर प्रकाश डालते हुए मोहनदास नैमिशराय ने लिखा है कि- “जन कवि बिहारी लाल ’हरित’ की विषय-चयन की विविधता सराहनीय है। चाहे वह अस्पृश्यता की समस्या हो या मजदूरों-किसानो के हकों की लड़ाई या फिर स्त्री अस्मिता की बात हो वह कहीं भी बेबाक होकर अपनी बात करने से नहीं चूकते हैं। उन्होंने आंबेडकर और आंबेडकरवादी चिंतन से प्रेरणा लेकर भारतीय समाज में अपने साहित्य द्वारा जातीय भेदभाव, उत्पीड़न, पोंगा पंडितों के पाखंडवाद तथा धार्मिक उन्माद जैसी भयंकर सामाजिक बीमारियों पर कुठाराघात किया। दलित स्त्रियों की स्वतंत्रता तथा उनकी अस्मिता को बचाए रखने में व्याप्त पितृसत्ता के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई, स्त्रियों को उनके अधिकार दिलाने की वकालत की।” [8]

उपर्युक्त अंश से यह स्पष्ट होता है कि बिहारीलाल ‘हरित' के रचना संसार में सदियों से दमित, पीड़ित तथा उपेक्षित लोगों की पीड़ा मौजूद है। जिसके प्रतिफल इनकी कविताओं में दमित-विरोध की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। कवि ने ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध करते हुए लिखा है-
“ज्यूं कदली के पात में, पात, पात में पात,
ज्यूं गदहन की लात में, लात, लात में लात।
ज्यूं कवियों की बात में, बात, बात में बात,
यूं हिन्दुन की जात में, जात, जात में जात।’ [9]
कवि ने इन काव्य पंक्तियों के माध्यम से जातिवाद के विरुद्ध दलित समाज में एक नया आक्रोश पैदा किया है। इनके काव्य जगत में जातिगत आक्रोश के साथ ही साथ समाज में दलितों के एकत्व भाव पर भी बात की गई है।

आधुनिक हिन्दी कविता में दलित संवेदना के स्वर आजादी के बाद की कविताओं में भी सुने जा सकते हैं। एक तरह से यदि देखा जाए तो आजादी के बाद की हिन्दी कविताओं में दलित कविता का जो विस्तार हुआ है वह विस्तार आजादी पूर्व नहीं था। मोहनदास नैमिशराय ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी दलित साहित्य’ में बहुत सारे कवियों के काव्य संग्रहों की सूची दी है। जो इस दलित काव्य विस्तार पर प्रकाश डालती है। इस सूची में मुख्य रूप से माता प्रसाद गुप्त कृत 'हरिजन ग्राम गीत' (1946 ई०), स्वामी भगत सिंह द्वारा रचित 'अछूतों का बिगुल' (1952 ई०), मोतीलाल संत का 'एक घूँट पानी' (1960 ई०), नत्थूराम ताम्रमैली कृत 'वीरों की तलवार' (1954 ई०) और स्वामी भगत सिंह द्वारा रचित 'संगठन के फूल' (1960 ई०) आदि काव्य संग्रह में मुख्यत: दलित संवेदना के स्वर सुने जा सकते हैं।

भारत एक जनतांत्रिक देश होने के बाद भी दलित समुदाय की सामाजिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। वे जैसे पहले थे वैसे आजादी के बाद भी रह गए। अन्तर बस इतना हुआ कि शोषक नीतियों में बदलाव हुआ। पहले वे जमींदार, सवर्ण, सामंत आदि के हाथों दोहित होते थे और आजादी मिलने के बाद राजनीतिक कुचक्रों से शोषित होने लगे। आजादी मिलने से दलितों को यह लाभ हुआ कि वे अपने दमित जीवन और दमनकारी नीतियों को पहचानने लगे। डॉ० दयानंद बटोही ने अपनी कविता 'द्रोणाचार्य' में लिखते हैं-
“एकलव्य मैं पहले था
आज भी हूँ
अब जान गया हूँ
अंगूठा दान क्यों मांगते हो।
अभी भी प्रैक्टिकल में पास-फेल की नीति है
द्रोण! यह तुम्हारी परंपरा की दुर्नीति है।” [10]
निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि आधुनिक हिन्दी कविता में दलित संवेदना के स्वर की अभिव्यक्ति सशक्त रूप से हुई है। ये दलित कविताएं हिन्दी कविता के जनतंत्र को अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। इन दलित कविताओं की ही देन है जो आधुनिक काल से लेकर आज तक हिन्दी साहित्य में दलित संवेदना के स्वर रचे जा रहे हैं। आधुनिक हिन्दी कविता में हीरा डोम ने जिस दलित संवेदना से परिपूर्ण काव्य रूपी वटवृक्ष का बीजारोपण किया था वह स्वामी अछूतानंद, निर्घिनराम और बिहारीलाल 'हरित' से लेकर डॉ० दयानंद बटोही, ओमप्रकाश वाल्मीकि, जयप्रकाश कर्दम, ठाकुरदास सिख, कंवल भारती और सी० बी० भारती आदि कवियों द्वारा सिंचित होकर एक विशाल वटवृक्ष बनकर खड़ा हो गया है। जिसमें शोषित, दमित, गरीब, उपेक्षित और पद्-दलित आदि की पीड़ा का पल्लवन हो रहा है। जिसमें दलित लोगों की विभिन्न संवेदनाएं मौजूद हैं।

सन्दर्भ स्रोत :-
  1. ‘वागर्थ’, अंक 334 जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या- 35
  2. पन्त सुमित्रानन्दन, ‘पल्लव’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, नवाँ संस्करण : 1993, पृष्ठ संख्या- 62
  3. शर्मा डॉ० रामविलास, सं०, ‘राग विराग’, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण : 2005, पृष्ठ संख्या- 137
  4. दिनकर रामधारी सिह, ‘रश्मिरथि’, उदयांचल प्रकाशन, पटना, संस्करण : 1998, पृष्ठ संख्या- 17
  5. चौधरी उमाशंकर, ‘दलित विमर्श-कुछ मुद्दे कुछ सवाल’, आधार प्रकाशन, पंचकूला, पहला संस्करण : 2011, पृष्ठ संख्या- 07
  6. ‘उपनाह साहित्य निराला की दलित चेतना’, ‘हंस’, जनवरी 1997, पृष्ठ संख्या- 75
  7. नैमिशराय मोहनदास, ‘हिन्दी दलित साहित्य’, साहित्य अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 2018, पृष्ठ संख्या- 46
  8. वही, पृष्ठ संख्या- 49-50
  9. वही, पृष्ठ संख्या- 50
  10. वही, पृष्ठ संख्या- 103
ओम प्रकाश, पीएच० डी० शोध छात्र, हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश- 226007 ईमेल- opji2019@gmail.com मोबाइल नंबर- 9451692485, 8922879120