Included in the UGC-CARE list (Group B Sr. No 172)
Special Issue on Dalit LIterature
ब्रेइनवाॅश कविता संग्रह में दलित विमर्श
गुजराती दलित कविताओं का अनुवाद ‘ब्रेइनवाॅश‘ शीर्षक कविता संग्रह में किया गया है जिसके संपादक हरीश मंगलम्, मधुकान्त कल्पित एवं अरविंद वेगडा जी हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2013 में हुआ। जिसमें मैंने भी 14 कविताओं का अनुवाद किया है, जिसके शीर्षक इस प्रकार हैं - ' गोकुल गांव और कानिया ', ' दाग' , ' खरोंच', ' हिंस्त्रता', ' अब कभी ' , ' अडिग', ' लगता है कि ', ' खुलासा', ' सूरज उदित हुआ ', ' मेरे हिस्से का उजाला ', ' बाप की सीख ', ' सुगमता ', ' वाड बिना का खेत ', ' मैं और बालक '। गुजराती साहित्य में दलित साहित्य की धारा का प्रभुत्व पिछले चार दशक से प्रभावशाली रहा है। गुजरात में सर्वप्रथम दलित रचना ‘आंतर वेदना‘ (1929) हमें श्री मनोर जीवराम गांगेरा से मिलती है, जो गुजराती दलित साहित्य के इतिहास में प्रतिष्ठित है।

संपूर्ण देश में आधुनिक दलित कविता के लेखन की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। गुजरात राज्य यह महाराष्ट्र का पड़ोसी प्रदेश होने से इस साहित्यिक घटना का प्रभाव स्वभाविक है कि सबसे पहले पड़ोसी राज्य पर होगा। गुजराती में प्रतिबद्ध दलित कवियों में सर्वप्रथम श्री प्रीतम लखवाणी, डाॅ. पथिक परमार, सरुप ध्रुव, महेश चन्द्र पंडया, प्रवीण गढ़वी, साहिल परमार, बिपीन गोहेल, नीरव पटेल, मधुकान्त कल्पित, अरविन्द वेगडा, हरीश मंगलम्, राजु सोलंकी, कान्तिलाल मकवाणा, जीवण ठाकोर, यशवंत वाघेला, दलपत चौहान, ए.के. डोकिया, चंद्राबेन श्रीमाली आदि हैं।

‘ब्रेइनवाॅश‘ शीर्षक काव्य संग्रह में गुजराती भाषा की 108 कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया गया है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में विषय की विविधता देखी जा सकती है जैसे दलितों की सामाजिक स्थिति का वर्णन, उनकी दिनचर्या, बहिष्कार, अस्पृश्यता, दलितों की वेदना, अस्तित्व, आरक्षण, अशिक्षा, रूढ़िगत परंपरा, दलित नारी का शोषण, उनकी पीड़ा आदि को बड़ी ही मार्मिकता के साथ कवियों ने शब्द बद्ध चित्रित किया है।

‘गोकुल गाँव और कानिया‘ शीर्षक कविता में कवि पथिक परमार ने दलितों की दिनचर्या का वर्णन इस प्रकार किया है-
"गाँव में कोई पशु मरे तो
ठेले पर
कानिया लाता वास में उसे
और हो जाता उजियारा
गाँव के लोग तो खाते माखन-मिसरी
और कानिया का घर घूघरा फाँककर जीए छाती फाड़ के।" [1]
मृत पशु को लेकर दलित कानिया जब घर आता है तब उनके घर में खुशी का माहौल बन जाता है यहाँ पर कवि ने मृत पशु की चर्बी के टुकड़ों को घूघरा कहा है जिसे खाने की खुशी में एक प्रकार की उनकी विवशता को हमारे समक्ष बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया है। समाज द्वारा जबरन मिले गंदे व्यवसायों के कारण ग्रामीण दलित घृणा और तिरस्कार का शिकार थे, वह चाहे तो उन्हें भी इससे छुटकारा नहीं मिल सकता था, आखिर वह जाए भी तो कहाँ ? सभी जगह पर यही स्थितियाँ थी। ग्रामीण सवर्णों की संस्कृति से उसकी अपनी एक अलग संस्कृति थी। कारण यह था कि उसका मोहल्ला भी अलग था और उसके आर्थिक आधार भी। पूरे दलित समाज की सामाजिक स्थिति को दर्शाने में निम्नलिखित कविता महत्त्वपूर्ण है-
"महल के बाथरुम जितना नन्हासा रुम
जिसमें दो-तीन बहूएँ मचाती हो बूमाबूम (शोरशराबा) धूप में टीन की छत यूँ अंगारे बरसाती, मानो मजाक उड़ाती
चलिए आपको दिखलाऊँ मैं हीरालाल की चाली।" [2]
छोटे से ही टीन की छत वाले घर में कई सदस्यों के साथ गर्मी के मौसम में दलित परिवार का गुजर-बसर किस प्रकार होता है, टूटे फूटे जर्जरित घर में रहने की सामाजिक स्थिति को चित्रित करते हुए कौए के बोझ से मनजी का पूरा घर ही जमीन दोस्त हो जाता है, यह वर्णन उनकी अति बदहाली को बतलाता है। मंगल परमार की ‘जरा ऐसा करना‘ शीर्षक कविता में भी इस प्रकार का वर्णन देखा जा सकता है। ‘सुगमता‘ शीर्षक कविता में कवि ने दलितों की तनतोड मेहनत के बाद पारिश्रमिक के रुप में जो सवर्ण परिवार उन्हें जूठन देता है, उसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण इस प्रकार किया है-
"तुम्हें उसे रात की बासी कढ़ी देनी है
यह मत भूलना
क्योंकि जूठन फेंकने की जगह
लगती है। आपको थोड़ी दूर
और वहाँ भी औरतें बडबड़ाती ही रहती हैं-
मरे कुत्ते भी सुधर गए हैं
उन्हें भी कोरी और चुपड़ी हुई रोटी का पता चल जाता है।" [3]
दलितों की प्रति किया जाने वाला अस्पृश्यता का व्यवहार उनके मन-मस्तिष्क ही नहीें उनकी आत्मा को भी विचलित करता है। गरीब दलित का बच्चा जब विद्यालय में प्रवेश लेकर पहले दिन कक्षा में प्रवेश करता है तब उसके लिए स्थिति किसी प्रलय के समान ही कही जा सकती है। वहाँ शिक्षा देने से पहले ही उसकी जाति का उल्लेख किया गया, तबसे ही वह आजीवन अछूत और अस्पृश्य हो गया-
"शाला में प्रथम प्रवेश
था साक्षात् प्रलय ही।
कंपित हाथों से पाटी में ‘अ‘ से ‘अनार‘ नहीं
सहरा की चिलचिलाती अंगार भूमि-सी धड़कती छाती में
लिखी गई मेरी जाति।
तब से मैं अछूत हूँ। अस्पृश्य हूँ........ अस्पर्श्य हूँ।" [4]
आरक्षण को लेकर जब-जब शहर में दंगे हुए हैं तब-तब गरीबों की झोपड़ियाँ जला दी गई हैं। अति दरिद्रता में जीने वाले परिवार का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है-
"दंगाग्रस्त शहर के
तरह-नहस हुए खपरैल और बाँस की खपचियों के बीच से
उखाड़ लिए गए छप्पर के टेढ़े-मेढ़े हो गए टीन
और उसकी धार
रक्तिम आँसू बहा रही थी..........टप......टप.....टप
जिसकी उठ रही आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी।" [5]
‘अस्पृश्य कौआ‘ शीर्षक कविता में सवर्ण समाज में दलितों की भूमिका एवं सेवा को दर्शाया गया है। दलित कहता है कि मैं- कपड़े बुनता हूँ ताकि लोगों का शरीर ढ़ँका हो, जूते सिलता हूँ ताकि, उनके पैरों को कड़ी धूप में जलने से बचा पाऊँ, लोगों के आंगन साफ करते हैं फिर भी कौआ और अछूत दोनों ही समाज की दृष्टि में सदा ही अस्पृश्य रहे हैं। यहाँ दोनों परोपकारी जीवों को समाज ने सदा तिरस्कृत ही किया है। इस तिरस्कार के बदले में परोपकारी जीव सदा उदारता ही दिखाते रहे हैं।

दलितों की व्यथा यही है कि जिस देश में उन्होंने जन्म लिया है वहाँ उन्हें कभी भी अपनापन नहीं मिल पाया। सदैव ही वह तिरस्कृत हुए। इसलिए यहाँ की संस्कृति उन्हें अपनी नहीं परकीय लगती है जिसे अब वे नहीं ओढ़ना चाहते। ‘व्यथा‘ ‘इंसान होने की वेदना‘, ‘बहिष्कृत फूल‘, ‘चौपड़' मेरे हिस्से का उजाला आदि कविताओं में इसी प्रकार की व्यथा जो चित्रित किया गया है जैसे-
"आँखें होते हुए भी मैं सूरदास
हाथ-पैर सहित की पंगुता लेकर
अस्मिता को इस तरह
कब तक तड़पता रहूँ विवश होकर ?
क्या मेरे हिस्से का वह उजाला
यहाँ कोई नहीं दे सकेगा मुझे ?" [6]
यहाँ पर दलित अपनी अस्मिता अपने हिस्से के उजाले को पाने के लिए संघर्ष करते नज़र आते हैं। यहाँ पर उनका प्रश्न संपूर्ण दलित समाज का प्रश्न बनकर खड़ा है।

दलितों में शिक्षा का अभाव आज भी देखा जा सकता है। हमारे समाज में दलितों को शिक्षा पाने से भी रोका जाता था। उन्हें केवल लोगों की गंदगी साफ करने के लिए विवश किया जाता था। शिक्षित होने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था। ‘माफ करना, दोस्त रघला‘ शीर्षक राजु सोलंकी की कविता में एक दलित की अशिक्षित रह जाने की पीड़ा को अभिव्यक्ति इस प्रकार दी गई है-
"माफ करना, दोस्त रघला।
तुम्हारी तरह शंकुतला को सर पे रख
नहीं नाच सकता मैं
मैं तो हूँ पाटण गाँव का माला ढ़ेड।
कच्चे कुँआरे कान में
धधकता शीशा डाला
तब से आँखों को घेरे है
उपनिषदों का आध्यात्मिक अंधेरा।" [7]
ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में एक मनुष्य जब दूसरे मनुष्य को मनुष्य ही नहीं समझता तब कई प्रश्न आकर खड़े होना स्वाभाविक है। दलित कविताओं में ऐसे कई प्रश्न देखे जा सकते हैं। प्रस्तुत काव्य संग्रह में कई कविताओं में कवि ने व्यंग्य के माध्यम से अपनी संवेदनाओं को ईश्वर से प्रश्न पूछते हुए कहते हैं-
"हरिगुन गाते गाते
मैं तो ढ़केलता फौलादी रथ
तेरी रथयात्रा लगती अब तो व्यर्थ
प्रभु तुझे कैसे भूलूं ?" [8]
पूरे समाज की गंदगी को साफ करने का ज़िम्मा दलितों ने उठाया हुआ है यदि वे ये कार्य न करें तो चारों ओर गंदगी ही गंदगी होगी। समाज में उनके इस महत्त्वपूर्ण कार्य को, आज भी कई लोग हीनता की दृष्टि से देखते हैं। 'कुत्ते भौंकत्ते हैं' शीर्षक कविता में कवि ने व्यंग्य किया है ऐसे ही लोगों पर-
"स्वच्छ रखें माहौल को स्वयं का होम करके और हमारे घर का आंगन साफ करते हैं तो कुत्ते भौंकते हैं" [9]
प्रस्तुत काव्य संग्रह में ‘बाड़ बिना का खेत‘, ‘सारे जहाँ से अच्छा, गाँधी, शहर और पूतला, ‘आप उन लोगों को पहचाने‘ आदि कविताओं में व्यंग्य के स्वर देखे जा सकते हैं जिनमें कवियों ने दलितों को व्यंग्य के माध्यम से जागृत करने का प्रयास किया है। आज आवश्यकता है कि वे उन लोगों की वास्तविकता को पहचाने जो अपना वास्तविक चेहरा आपसे छिपाकर आपका शोषण करते हैं और आप उन्हें पहचान नहीं पाते हैं इसलिए कवि कहते हैं-
"वे लोग चबूतरे भी बनते हैं....और
पंखियों को फाँसते हैं जाल में !!!
वे लोग यज्ञ भी करते हैं और
समिध की तरह जला देते हैं आप को
वे लोग!
पंचमहाभूत में विलीन होने से पूर्व
प्रतिपल विलीन करते हैं आपको !!!
आप उन लोगों को पहचानें।" [10]
दलित नारी की बात करें तो दलित नारियों को दोहरे शोषण को झेलना पड़ता है। सवर्ण समाज यदि उसका शोषण करता है तो उसका अपना परिवार और समाज भी उसे यातनाएँ देता है। दलित स्त्री अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी करती है, तन-तोड़ परिश्रम भी करती है, किन्तु उसका पति या परिवार उसका सम्मान नहीं करता बल्कि उसे अपने ही घर में गालियाँ, अपमान, उपेक्षा ही मिलती है। शामत परमार की ‘अछूत लड़की‘ शीर्षक कविता में दलित के घर जन्मी लड़की की पूरे जीवन की कथा को ही कुछ पंक्ति में प्रस्तुत कर दिया है। प्रियंका कल्पित की ‘सवर्ण भगवान‘ कविता में दलित के शोषण पर मनुष्यों की चुप्पी तो ठीक है किन्तु भगवान के मौन रहने पर भी प्रश्न खड़ा किया गया है। जब दलित युवती पर पूरा समूह कीचड़ फैंकता है उसे दंड देता है। सभी उस पर अत्याचार करते हैं तब दलिता के शब्दों में-
"मेरे भीतर प्रश्न
मंडराने लगा
लोग तो ठीक
सामने मंदिर में बैठे
भगवान ने भी
मुझे क्यों न बचाया ?
क्या उसके भी आड़े आया होगा
मेरा अछूतापन ?" [11]
गुजराती दलित कविता में दलित नारी के प्रति समाज की संवेदनहीनता की यथार्थ अभिव्यक्ति मिलती है। समाज की दृष्टि में नारी मात्र उपभोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं पर सत्यम बारोट की ‘भारत माँ‘ शीर्षक कविता में कवि दलित नारी की इसी संवेदना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-
"कूडा करती साफ़
झाडू लेकर.....!!?
किसीने देखा काम तक सीमित
कच्चा-कच्चा अंग मेरा
जीर्ण चुनरी में
चोली करती फांटु-फाटुं/(तंग-तंग चोली)
पर न देखा
मैं
कूड़ा करती साफ़
झाडू लेकर....!" [12]
‘आरक्षण‘ एक महत्त्वपूर्ण पहलू है दलित साहित्य में। आधुनिक गुजराती दलित कविता के उद्भव में गुजरात में हुए ‘आरक्षण विरोधी आंदोलन‘ की अपनी भी भूमिका थी। गुजराती दलित कविता में आरक्षण का मुद्दा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से अभिव्यक्त हुआ है। आरक्षण के कारण दलितों पर अत्याचार भी हुए हैं।

दलित वर्ग के पास यातना और वेदना के अनुभवों का उफनता हुआ समुंदर है। ज्ञान की परंपराओं से हजारों वर्षों तक दूर रखे गए दलित वंचितों को नए आलोक से समता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित समाज में बहुजन को सम्मान और अधिकार मिलेगा यह आशा अवश्य है। अपने अस्तित्व को मान्यता प्रदान करने के लिए व्यवस्था के निर्मूलन के लिए प्रतिबद्धता का संकेत भी करते हैं। विश्व अदालत में न्याय पाने की अपेक्षा के साथ वे कहते हैं-
अब तो
रख दो नसनस में इसववकेनबामत
और
प्रचंड ज्वालामुखी के
लावा पर लटकते
काँपते
छटपटाते
हमारे अस्तित्व को मान्यता प्रदान करो
विश्व-अदालत में ! [13]
दलित साहित्यकार चाहे जिस क्षेत्र का हो उसने अपने जीवन में कभी-न-कभी किसी न किसी रुप में जातिगत अन्याय, अपमान और उपेक्षा का दंश झेला है। दर्द के साथ दलित का रिश्ता जन्म से है। दलित को जन्म के साथ ही जातिगत भेदभाव, उपेक्षा और अस्पृश्यता को झेलना पड़ता है। इस अन्याय और अमानवीयता को दूर करने का विचार करने पर एक लंबे संघर्ष का विचार अपने आप साथ में जुड़ जाता है। दलित कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने इस विचार को, सदियों से मिले दर्द की वेदना के अनुभव को संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है। ' ब्रेइनवॉश' शीर्षक कविता में कवि ने ब्राह्मण महिला की मृत्यु के पश्चात् उसकी खोपड़ी को उसके द्वारा पीड़ित दलित सात पवित्र नदियों के जल और डिटर्जेंट से घिस- घिस कर साफ़ करना चाहता है। यह सवर्णों द्वारा किए जानेवाले शोषण की पीड़ा की चरम सीमा ही होगी।
"मुझे थोड़ा गंगाजल दो।
और उसमें मिलाओं सात पवित्र नदीओं का जल।
मुझे इस चित्तपावन ब्राह्मिन की फटी हुई खोपड़ी में से
लटके हुए भेजे को घिस घिसके धोना है।
मुझे टाटा की डिटर्जन्ट टिकिया दो।
उसके भेजे के एक एक कोष मुज़े साफ करने हैं।
सदियों से जमा हुआ खयालों का जंग घिस घिस के निकालना है।" [14]
दलितों की बस्तियों को सदियों से गाँव के सिवान से दूर रखा गया। दलितों की बस्ती में फैले अज्ञान, गरीबी और रुढ़ी परंपराओं की गुलामी से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में उठी आवाज में विद्रोह, संताप और अंगार ही होगा। मुक्ति की आस में विद्रोह करने वाले कवियों ने सजगता का संकेत इन तीखे शब्दों में अभिव्यत किया है-
"किसने कहा ?
बासी रोटी के दो टुकड़े
और खट्टी ठंडी छाछ के लिए
सूखा देनी चाहिए पूरी उम्र
अन्याय अत्याचार के
दैत्य शिकंजे के पाश में
निरपराध होने के बावजूद
चुपचाप पिसते रहने का कोई मतलब ?
मुट्ठी उठाने के सिवा
इस जगत में
हमारी अस्मिता का
कोई अस्तित्व नहीं है।" [15]
यहां कवि दलित समाज को सामाजिक असमानता और अन्याय के विषय में जागृत करके, चुप रहकर अन्याय सहन करने के बदले अन्याय के प्रति संगठित होकर संगठित करने के लिए उत्तेजित का रहे हैं।

दलित कविता में ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों के साथ उनके मिथकों का प्रयोग युगीन सत्य की अभिव्यक्ति के लिए किया गया है। द्रोणाचार्य, परशुराम के षड़यंत्र और शम्बूक वध मनु मानस पुत्रों द्वारा किए जाने वाली परंपरा, रुढ़ियाँ, छल-कपट की पोल खोलने का प्रयास भी देखा जा सकता है। ऐसे पात्र जो शोषण के शिकार बने थे, आज के शोषित दलितों के साथ एकाकार हो जाते हैं। दलितों के पास बाबा साहब का दिया हुआ मंत्र है संविधान से रक्षित जीवनी है। दलित कविता केवल कविता नहीं, वह सदियों पुरानी विषमता मूलक सनातनी परंपराओं को दफन करने की एक विचारधारात्मक कार्यवाई है। यह एक ऐसा हथियार है जो इस अमानुषिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो रहा है। यह मानवाधिकारों को पाकर दलित वर्ग स्वाधीनता की उम्मीद करता है-
"तुम मानो या न माना
पर
हे मनु के मानसपुत्रों
अब तुम्हारे पुरखों की-मानुष को अमानुष बनाती-
दीमक का खात्मा करनेवाली दवाएँ,
एक-दो वर्ग-वर्ण की रुढ़ियाँ,
.......आदि कपट
और
सब की पोल अब खूल गई है।" [16]
दलित लेखन व्यापक परिवर्तनकारी उद्देश्यों को लेकर चल रहा है। दलित लेखन जहाँ एक ओर समाज में सकारात्मक परिवर्तन करके समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहता है वहीं वर्चस्ववादी उत्पीड़नकारी संस्कृति और मूल्यवस्था को भी समाप्त करना चाहता है। वह उस समाज की कल्पना कर रहा है जिसमें कोई भेदभाव न हो, कोई किसी का शोषण न करे, व्यक्ति की जाति से उसकी पहचान न हो बल्कि उसकी योग्यता से उसे पहचाना जाए। आदि उद्देश्यों की पूर्ति हेतु दलित साहित्य एवं लेखन निरंतर प्रयासत है। दलित कविता का स्पष्ट मत है कि-
"मानव की मानवता।
मर जाये उससे पहले।
उसे शांति पुरस्कार दे देना चाहिए।" [17]
मनुष्यता समाज में शांति, सदभाव और सह-अस्तित्व का आधार है मानवता होगी तो दलितों के जीवन का अंधकार मिटेगा उनके अंदर आत्म-विश्वास पैदा होगा। उनके जीवन में सवेरा होगा। ज्यादा देर होने से कहीं-
"मनुष्य के हृदय का प्रायश्चित
कायमी भूल बन जाये
उससे पहले
उसे शांति पुरस्कार दे देना चाहिए।" [18]
दलित कविता की यह चेतना और आशावादी दृष्टिकोण शोषण मुक्त समाज का स्वप्न देखने जैसा है जिसे वे यथार्थ में तब्दील करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। दलित कवियों ने कटू सत्य को अभिव्यक्त किया है। यह कविता कल्पना से नहीं, जमीन के ऊपर की दलितजन की यथार्थता से अभिव्यक्त हुई है। सामाजिक जागृति, अत्याचारों के खिलाफ और अंधकार रूपी तिमिर को दूर करने के लिए वे प्रतिबद्ध हैं। हरिवंशराय बच्चन कि यह काव्य पंक्ति यहाँ सर्वथा उचित है। "है अंधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है।"

संदर्भ सूची
  1. ‘ब्रेइनवाॅश‘ गुजराती दलित कविता सं. हरीश मंगलम्, मधुकांत कल्पित, अरविन्द वेगडा प्रकाशन हिमालयन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली पृ. सं. 1
  2. वही पृ. सं. 45
  3. वही पृ. सं. 140
  4. वही पृ. सं. 16
  5. वही पृ. सं. 34
  6. वही पृ. सं. 95
  7. वही पृ. सं. 112
  8. वही पृ. सं. 33
  9. वही पृ. सं. 63
  10. वही पृ. सं. 125
  11. वही पृ. सं. 126
  12. वही पृ. सं. 133
  13. वही पृ सं. 10
  14. वही पृ. सं. 3
  15. वही पृ. सं. 23
  16. वही पृ. सं. 42
  17. वही पृ. सं. 129
  18. वही पृ. सं. 130
डाॅ. पारुल सिंह, प्रभारी आचार्या, श्री कृष्ण प्रणामी आर्ट्स काॅलेज, दाहोद। मों नं. 9428673109